बुधवार, 4 मई 2016

मैक्लोड्गंज व धर्मशाला भ्रमण


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कांगडा फोर्ट घूमने के बाद करीब साढ़े बारह बजे हम लोग धर्मशाला के लिए निकल लिये। तय किया कि  आज धर्मशाला घूमेंगे और रात का स्टे भी धर्मशाला में ही करेंगे। लेकिन एक बार कांगड़ा से निकले तो फिर सीधे मैंक्लोडगंज पहुँचकर ही रुके। धर्मशाला बस अड्डे के पास से एक रास्ता नीचे की तरफ उतरकर धर्मशाला बाइपास से मैक्लोड्गंज जाता है। तो भाई, हमने अकल लगायी कि शहर की भीड से बच के बाइपास से चलते हैं। रास्ता तो अच्छा बना हुआ है लेकिन नीचे उतरने के बाद भयंकर चढाई देखकर हालत पतली हो गई। खैर इसके बाद अगले तीन दिन कभी भी हमने इस बाइपास का प्रयोग नही किया। कांगडा नीचे घाटी में बसा है और समुद्र तल से केवल 700 - 750 मीटर की ऊंचाई पर है जबकि मैक्लोड्गंज 1700-1900 मीटर पर है। धर्मशाला से मैक्लोड्गंज तक 9 किलोमीटर का रास्ता चढ़ाई वाला है। जब हम कांगड़ा मे थे तो गर्मी लग रही थी लेकिन जैसे – 2 मैंक्लोडगंज के समीप पहुच रहे थे तो थोडी-2 ठंड भी लगने लगी थी।

करीब डेढ बजे हम मैंक्लोडगंज पहुँचे और पहुँचते ही केस हो गया। हमेशा की तरह मैं और विनोद एक बुलेट पर थे और विनोद ने अपना हेल्मेट मुझे दे रखा था। जैसे ही हम मेंन चौराहे पर पहुँचे तो एक पुलिस वाले ने थाम लिया “जी साब, आपने हेल्मेट नी पहन रख्खा चलान कट्वाओ!”। हिमाचल के जिस हिस्से मे हम थे वहॉ पंजाबी भाषा खूब बोली और समझी जाती है। पुलिस वाला भी उसी अंदाज मे बोल रहा था। हमने टालने की बहुत कोशिश करी के “भाई हमने – मतलब विनोद ने, तो हेल्मेट यहीं उतारा था रास्ता पूछ्ने को”। मगर वो कहाँ मानने वाला था, ऐसे रास्ता पूछ्ने वालों को तो वो रोज देखता था। आंखिरकार काफी बात करने के बाद भी काम नही बना और हमें चलान कट्वाना पडा। मैक्लोड्गंज पहुँचते ही 200/- रुपये पुज गये। खैर, होटल के बारे में पता किया तो लोगो ने बताया के भागसू नाग की तरफ चले जाओ वहॉ अच्छे होटल्स थोडे सस्ते मिल जयेंगे मेंन मैक्लोड्गंज के मुकाबले। मेंन चौराहे से भागसू नाग 2 किलोमीटर आगे है। भागसू नाग टैक्सी स्टेंड से थोड़ा पहले ही होटल भागसू हाइट्स मे 1000/- का एक सही सा कमरा ले लिया। सवा दो बज चुके थे और भूख बडे जोरो की लगी थी। बस फिर क्या था तुरंत लंच का ऑर्डर दे दिया गया। फटाफट फ्रेश हो कर हम लंच पर टूट पडे। फिर आधे घंटे का आराम करके घूमने निकल पड़े।



सीधे भागसू नाग मंदिर गये। ये मंदिर भगवान भोलेनाथ को समर्पित है। मंदिर के सामने ही प्राकृतिक पानी को रोककर एक छोटा सा स्वीमिंग पूल बना रखा है। काफी जनता स्नान के मजे ले रही थी इसमे लेकिन हमने ये काम बाद के दिनों के लिये छोड दिया। भागसू बाबा को बाहर से ही प्रणाम कर के हम झरने की ओर निकल लिये। मंदिर से भागसू फाल – झरना, लगभग एक - सवा किलोमीटर दूर है। मंदिर के पास से ही झरने पर जाने के लिये पगडन्डी वाला रास्ता है जो कि आगे त्रियुंड तक जाता है जहां हमे कल जाना है। छोटा सा ही झरना है भागसू फाल लेकिन पर्यटक काफी आते हैं यहां और हम जैसे घुमक्कड भी। वाटरफाल पर कुछ फोटो खींच कर हम झरने के पानी के साथ-2 नीचे उतरकर वापिस आ गये। 

मैक्लोड्गंज में तिब्बती लोग बहुतायत में रहते हैं। दरअसल ये लोग साठ के दशक में दलाई लामा जी के साथ भारत आये थे और हीं बस गये। इसीलिये मैक्लोड्गंज को मिनी-तिब्बत भी कहा जाता है। ये तिब्बती लोग इसे "लिटिल ल्हासा" या "धासा" कहकर पुकारते हैं। भागसू फाल से वापिस आकर हम दलाई लामा मंदिर देखनेगये। कहीं लिखा देखा शायद इसका नाम "'Tsuglagkhang Temple-सुगलगखांग टेम्पल" है। तिब्बतियों के अलावा भारतियों के बीच भी यह काफी प्रसिद्ध है। दलाई लामा मंदिर देखने के बाद हम डल लेक देखने के लिये निकल गये।

जी हॉ। एक डल लेक मैक्लोड्गंज में भी है। छोटी सी ही झील है यह और अगर आपने नैनीताल या उसके आस-पास की झीलें देखी हैं तो फिर आपको ये झील देखकर निराशा ही हाथ लगेगी। मगर झील के पीछे वाली पहाडी पर देवदार के घने पेड एक सुंदर दृश्य प्रस्तुत करते हैं। झील वाले रास्ते पर ही कुछ आगे नड्डी गॉव है जहां पर न जाने कहीं सन-सेट पाईंट है। सन-सेट पाईंट तो हमे मिला नी पर हां वहां से र्फ वाले पहाडों का दृश्यडा ही सुंदर था। पिछले कुछ वर्षो में ड्डी गॉव के आस-पास बहुत सारे बडे-2 होटल बन गये हैं।

हमनें आधे दिन में ही मैक्लोड्गंज की सारी मुख्य जगहें देख ली केवल बाजार छोड कर। अंधेरा होते-2 हम अपने होटल पहुचें और डिनर के साथ-2 कल सुबह त्रियुंड जाने की प्लानिंग करने लगे। तय किया कि सुबह सात - साढे सात बजे तक निकल लेंगे। लेकिन सुबह उठे तो सारी प्लानिंग धरी की धरी रह गयी। तेज बारिश हो रही थी। मैक्लोड्गंज में बारिश बहुत होती है। कांगडा घाटी से आने वाली हवाएसाढे चार हजार मीटर उंचे धौलाधार के पहाडों को पार नही कर पाती और संघनित होकर यहीं बरस जाती हैंऐसे में ट्रेक पर जाना नामुमकिन था। नाश्ते के बाद भी खूब देर तक होटल के रेस्तरॉ मे बैठे रहे और बरिश मे अपने आज के अरमानों को धुलते देखते रहे। करीब साढे ग्यारह बजे बरिश बंद हुई तो टहलने  निकले। बाजार अभी तक खुले नही थे। केवल कुछ दुकानें ही खुल पायी थी। अगले एक घंटे तक ऐसे ही इधर - उधर घूमते रहे। अब धूप निकल आयी थी। कल होटल वाले ने बताया था कि यहॉ धर्मशाला के पास इंद्रुनाग में पैरा-ग्लाइडिंग भी होती है। अब जब हमारे पास त्रियुंड जाने का समय तो बचा नही था तो सोचा कि चलो धर्मशाला चलते हैं वहां स्टेडियम देखेंगे और इंद्रुनाग में पैरा-ग्लाइडिंग करेंगे। 
 
मैक्लोड्गंज मे हमारे होटल के पीछे


भागसू झरना और उसकी ओर जाती पगडंडी

हालांकि यह बहुत छोटा सा झरना है मगर भीड की यहाँ कोई कमी नही रहती।

झरने के नीचे पानी के साथ-2 वाले रास्ते मे चाय की दुकान और हाँ बैठे लामा

मैडम जी! कपडे धोना और पानी को न्दा करना मना है आपको किसी ने बताया नही क्या?

विनोद भाई की करामात, सुंदर युवतियां दिखी और उसने कैमरा फोकस करा !

झरने से नीचे उतरते विनोद और चौधरी साब !

एक फोटो बढिया सा चौधरी साब का भी खींच दे भाई

विनोद भाई


ने के नीचे वाले रास्ते पर मिले कुछ कपल्स
दलाई लामा मंदिर के अंदर भगवान बुद्ध की प्रतिमा। ये चित्र मोबाइल से लिया था इसीलिए जरा अच्छा सा नी आ रा। 
इन पीपे जैसे सिलेंडरों के अंदर मणिरत्न भरे हुए हैं और ऐसी मान्यता है कि इनको घुमाने से एक लाख मंत्रों के जप के बराबर पुण्य मिलता है। यहॉ मैं और विनोद पुण्य कमा रहे हैं।

डल झील के उपर वाले पहाड पर देवदार के घने वृक्ष। इसी पहाडी के पीछे बायीओर कहीं गुना देवी का मंदिर है। मंदिर के लिये 5 किलोमीटर का ट्रैक झील के थोडा सा आगेड्डी गॉव के पास से जाता है।

  
दोपहर को हम धर्मशाला घूमने निकल गये थे। सीधे धर्मशाला स्टेडियम पहुंचे। बडा ही खूबसूरत है ये स्टेडियम। विवेक भाई छा गये इस सेल्फी में।

धर्मशाला स्टेडियम - शायद सबसे सुंदर और सबसे उंचाई पर स्थित अंर्तराष्ट्रीय  क्रिकेट स्टेडियम है।

वैसे मुझे धर्मशाला स्टेडियम थोडा छोटा लगा

है ना वाकई सुंदर !!

वो दूर पीछे वाली पहाडी पर दो मोबाइल टावर दिख रहे हैं। वो जगह इंद्रुनाग है जहाँ पैरा-ग्लाइडिंग होती है। हम लोग भी गये थे वहाँ मगर अफसोस पैरा-ग्लाइडिंग नही कर सकेट्रेनर ने कहा आज विंड स्पीड बहुत ज्यादा है आप लोग कल आना। लेकिन हमे तो कल हर हाल मे त्रियुंड ट्रैक करना है तो हमने कहा बस भाई हम ना आ रे अब कल। बस अब फिर कभी आयेंगे यहां या बिलिंग तब जरूपैरा-ग्लाइडिंग करेंगे।

शाम को धर्मशाला से वापिस आकर भाग्सू-नाग मंदिर परिसर के स्विमिंग पूल मे स्नान किया गया। कसम से बडा डा पानी था। बस नहाने के बाद चाय-मैगी का आनन्द लिया और टहलते हुए वापस होटल आ गयेसुबह अब हम लोग त्रियुंड जायेंगे। 



बडी देर से त्रियुंड-2 पढकर आप लोग पक गये होंगे मगर माफ कीजियेगा इसके बारे मे विस्तार से अगली पोस्ट मे ही बताउंगा। तब तक कृप्या लोड ना लें।


video 
धर्मशाला जाते समय ये वीडियो बनाया था। 


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4 टिप्‍पणियां:

  1. kabhi hame bhi karana yatra mere bhai. tumhari post bahut achchhi h. aisa lagta h jaise post padhhne wala
    bhi sath2 yatra kr raha ho.

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  2. धन्यवाद भाई। हां भाई जरूर चलेंगे जब तुम कहो।

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