गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

रूपकुंड ट्रैक - हरिद्वार से लोहाजंग

30 सितम्बर, 2017
उत्तराखंड के चमोली जिले में गढवाल और कुमाऊं की सीमा पर एक विशाल पर्वत गुच्छ है - नंदा देवी रेंज। जिसमें नंदा देवी (भारत की दूसरी सबसे ऊंची चोटी - करीब 7800 मीटर), त्रिशूल (7150 मीटर के करीब), नंदाघुंटी, नंदाकोट, नंदाखाट, मृगथुनी  आदि अनेकों पूरे वर्ष हिमाच्छादित रहने वाली चोटियां हैं। यह पूरा इलाका नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के नाम से जाना जाता है। यहीं पर करीब 16000 फुट ( ‍‍‍‍‍~4850 मीटर) की ऊंचाई पर त्रिशूल चोटी के नीचे स्थित है रुपकुंड झील। वैसे तो पूरे उत्तराखंड में ही बहुत सारी झीलें हैं मगर रुपकुंड उन सबमें अलग है - अनोखी है, रहस्यमयी है। अनोखी और रहस्यमयी इसलिये क्योंकि इस झील में अनेकों मानव कंकाल बिखरे पडे हैं। जो कार्बन डेटिंग़ के रिजल्ट के अनुसार नवीं शताब्दी के आसपास के हैं। करीब 200 से 500 मानवों के कंकाल यहाँ बताये जाते हैं। जिसका मतलब है कि कोई बहुत बडा ग्रुप यहाँ रहा होगा जो अत्यधिक बर्फबारी या किसी अन्य प्राकृतिक आपदा या हादसे का शिकार हो गया और उन सबकी मौत हो गयी। अत्यधिक ऊंचाई और अधिकांश समय बर्फ में दबे रहने के कारण ये कंकाल आज भी रुपकुंड में ऐसे ही सुरक्षित हैं। 

अब अगर रुपकुंड लेक और नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क की बात हो रही है तो थोडी बात नंदा देवी राजजात यात्रा की भी कर लेते हैं। उत्तराखंड के प्रसिद्ध सांस्कृतिक आयोजनों में से एक नंदा देवी राजजात यात्रा इसी इलाके में होती है। नंदा देवी गढवाल और कुमाऊं दोनो मंडलों की इष्ट देवी है और इसी कारण इसे राजराजेश्वरी भी कहा जाता है। नंदा देवी को माता पार्वती की बहन के रुप में जाना जाता है बल्कि कहीं - कहीं तो इसे पार्वती के ही एक रुप में पूजा जाता है। पूरे उत्तराखंड में एक समान रुप से मान्यता होने के कारण ही नंदा देवी उत्तराखंड को एकता के सूत्र में बांधती है। नंदा देवी से जुडी यात्रा या जात दो प्रकार की है - वार्षिक जात और राजजात। वार्षिक जात हर साल अगस्त - सितम्बर माह में होती है जो कुरूड के नंदा देवी मंदिर से शुरू होती है और बेदनी बुग्याल स्थित बेदनी कुंड तक जाकर लौट आती है। जबकि राजजात बारह वर्ष में एक बार होती है और मान्यता के अनुसार चमोली जिले के नौटी गांव से शुरू होती है। रास्ते में और भी जगहों से अन्य डौलियां इस जात में शामिल होती हैं। राजजात लगभग 250 किमी की यात्रा तय करती है और अंत में लोहाजंग - वाण - बेदनी बुग्याल - रुपकुंड - जुनार्गली होते हुए होमकुंड पहुंचती है। होमकुण्ड से चनण्याँघट (चंदिन्याघाट), सुतोल से घाट होते हुए नन्दप्रयाग और फिर नौटी आकर यात्रा का चक्र पूरा होता है।

इस राजजात में चौसिंग्या खाडू़ (चार सींगों वाला भेड़) भी शामिल किया जाता है जोकि स्थानीय क्षेत्र में राजजात का समय आने के पूर्व ही पैदा हो जाता है, उसकी पीठ पर रखे गये दोतरफा थैले में श्रद्धालु गहने, श्रंगार-सामग्री व अन्य हल्की भैंट देवी के लिए रखते हैं, जोकि होमकुण्ड में पूजा होने के बाद आगे हिमालय की ओर प्रस्थान कर लेता है। लोगों की मान्यता है कि चौसिंग्या खाडू़ आगे बिकट हिमालय में जाकर लुप्त हो जाता है व नंदादेवी के क्षेत्र कैलाश में प्रवेश कर जाता है।

यूं तो नंदा देवी राजजात यात्रा पर जितना लिखा जाय उतना कम है मगर एक मोटी - मोटी जानकारी उपर दे दी गयी है जो मेरे कुछ गढवाली दोस्तों, रुपकुंड यात्रा के दौरान लोकल लोगों द्वारा दी गयी जानकारी और विकीपिडिया पर उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। चुंकि मैंने रुपकुंड की यात्रा (ट्रैक) की है इसलिए अब आगे उसी के बारे में चर्चा की जायेगी।

चमोली जिले के कर्णप्रयाग से एक रास्ता पिंडर नदी के किनारे - किनारे सिमली होते हुए थराली जाता है। थराली से एक रास्ता देवाल, मुंदोली व लोहाजंग होते हुए वाण गांव तक पहुंचता है जहाँ से रुपकुंड ट्रैक की शुरुआत होती है। वैसे रुपकुंड जाने के दो मुख्य रास्ते हैं। पहला वाण से गैरोली पाताल, बेदनी बुग्याल होते हुए और दूसरा लोहाजंग से चार किलोमीटर आगे कुलिंग़ गांव से दीदना, आली बुग्याल होते हुए। मेरे हिसाब से वाण वाला रास्ता थोडा सा कम थकान वाला है जबकि कुलिंग़ - दीदना वाले रास्ते पर चढाई ज्यादा है। टोटल एक साइड से लगभग 25-26 किलोमीटर का ट्रैक है रूपकुंड तक के लिये।
वैसे तो मैं काफी समय से रुपकुंड के बारे में पढता आ रहा था और वहां जाने की सोचता भी रहता था। मगर इसी साल वहां जाना होगा ऐसा सोचा नही था। गांववाले दोस्तों मोनू, विकास और पंडत जिनके साथ मैं इस साल केदारनाथ गया था उनसे बात हुई तो उन लोगो ने दशहरे के आसपास कहीं घूमनें चलने के बारे में कहा। इस समय मेरी भी तीन दिन की छुट्टियां थी और श्रीमती जी को मायके जाना था 10-15 दिन के लिए, तो प्लान बनने लगा यमनोत्री, गंगोत्री और गौमुख जाने का। इस यात्रा में लगभग एक सप्ताह का समय लगने वाला था तो उसी हिसाब से ऑफिस में एक्स्ट्रा छुट्टियां ली जायेंगी। धीरे - धीरे हमारी प्लानिंग इसी दिशा में आगे बढने लगी। लेकिन मुझे इस समय में गौमुख जा पाना मुश्किल सा लग रहा था। क्योंकि 30 सितम्बर व 1 -2 अक्तूबर की सरकारी छुट्टी थी तो मुझे लगा शायद ऐसे में हमें वन विभाग से गौमुख जाने का परमिट नही मिलेगा जिससे हम गंगोत्री से आगे नही जा पायेंगे। क्योंकि शायद गंगोत्री से 1-2 किमी आगे कनखू से गंगोत्री नेशनल पार्क शुरू हो जाता है जिसमें गौमुख या उससे आगे जाने के लिए वन विभाग का परमिट लगता है जो उत्तरकाशी और गंगोत्री में बनता है। अपने इस "डाउट" को मैंने मोनू - विकास लोगों के सामने रखा और कहीं दूसरी जगह चलने के बारे में विचार करने को कहा तो वो बोले के भाई हमें तो घूमना है चाहे कहीं चलो। इसके बाद ही मेरे दिमाग में रुपकुंड का ख्याल आया और अपने इस खयाल से इन लोगों को अवगत कराया तो शुरु में तो सब राजी हो गये। सबकी इस हाँ पर मैंने आगे रुपकुंड के बारे में जानकारी जुटाना शुरू कर दिया - मतलब कैसे जाना है, कहाँ रुकना है, रहने खाने का क्या बंदोबस्त करना है? वगरह, वगरह। मगर 4-5 दिनों के बाद ही इन लोगों ने रुपकुंड जाने से मना कर दिया और फिर से यमनोत्री, गंगोत्री जाने की बात करने लगे। उधर मैंने कई दिनों से रुपकुंड की काफी जानकारी इकट्ठा कर ली थी। और उपर से जब इन लोगों की यात्रा में गौमुख नही हो पा रहा है तो खाली गंगोत्री जाने का क्या लाभ? इसी सोच के साथ मैंने अकेले रुपकुंड जाने का फैंसला किया।
30 सितम्बर की सुबह छहः बजे मैंने हरिद्वार स्थित अपने क्वार्टर से प्रस्थान किया। अकेला होने के कारण न तो मुझे कहीं किसी का इंतजार करना था न ही कहीं जगह जगह रुकना पडा। करीब साढे सात बजे बयासी पहुंचकर चाय - परांठे का नाश्ता किया और आगे बढ चला। सवा नौ बजे देवप्रयाग पहुंचा और संगम के कुछ फोटो लिये, स्कूटी में टेंक फुल कराया और 10-15 मिनट यहाँ रुककर आगे बढ गया। आज दशहरा था यानि छुट्टी का दिन तो रास्ते में कहीं भी कुछ खास ट्रैफिक नही मिल रहा था। हाँ, लेकिन आज पहाड में जगह - जगह शादियां बहुत हो रही थी। हर किसी छोटे - बडे कस्बे में कोई न कोई शादी थी आज। वापस आने पर मेरे एक पहाडी दोस्त आशीष मैठानी ने मुझे बताया कि पहाड में दशहरे के दिन शादियों का मुह्र्त होता है। खैर मैं आराम से श्रीनगर पार करके करीब साढे ग्यारह बजे धारी देवी के पास पहुंचा। नीचे अलकनंदा नदी के बीच में ही धारी देवी का मंदिर है जिस तक जाने के लिए एक लोहे का पुल बना है। दरअसल पहले यह मंदिर नदी के किनारे था मगर श्रीनगर में कोई जल विद्युत परियोजना के चलते इसे विस्थापित करना पड रहा था। कहते हैं 2013 में जिस दिन धारी देवी की मुर्ति को विस्थापित करने के लिए उठाया गया उसके अगले ही दिन उत्तराखंड में केदारनाथ आपदा आयी थी। जिस वजह से धारी देवी को विस्थापित नही किया गया बल्कि उसी स्थान पर उपर उठा दिया गया और अब वहां नदी के उपर ही धारी देवी का भव्य मंदिर बन रहा है। यहाँ आज थोडी बहुत भीड थी। कल ही नवरात्र खत्म हुए थे और काफी लोग धारी देवी के दर्शन करने आये हुए थे। मैंने भी स्कूटी एक दुकान वाले के पास खडी की और नीचे मंदिर की ओर देवी मां के दर्शन करने चला गया। काफी लम्बी लाइन लगी थी और अगर मैं साइड से आगे जाकर दूसरी तरफ से मंदिर में ना जाता तो मुझे लाइन में ही कम से कम एक - डेढ घंटा लग जाता। ऐसे दर्शन करने में भी करीब आधा घंटा लगा मुझे टोटल। अभी आज मुझे बहुत आगे जाना था। इसलिए बिना देरी किए स्कूटी उठाई और निकल लिया।

दो बजे के करीब कर्णप्रयाग पहुंचकर खाना खाया और थराली - ग्वालदम जाने वाले रास्ते के बारे में पता कर उस पर बढ चला। पांच किलोमीटर दूर सिमली आया। यहाँ से एक रास्ता गैरसैण - चौखुटिया - द्वाराहाट होते हुए रानीखेत जाता है जबकि दूसरा रास्ता थराली - ग्वालदम - बैजनाथ होते हुए अल्मोडा जाता है। मैं इसी दूसरे रास्ते पर बढ चला। शुरु के 3-4 किमी तक तो रास्ता बढिया बना हुआ था लेकिन उसके बाद नारायणबगड और उससे भी आगे करीब 8-10 किमी का रास्ता एकदम खराब था। दरअसल इस पूरे इलाके में लैंडस्लाइड हो रखा था और कहीं - कहीं तो अभी भी सडक से मलबा हटाने का कार्य चल रहा था। ऐसी ही एक जगह मुझे भी करीब 10-15 मिनट के लिए रुकना पडा। अब मुझे समझ आया था कि क्युं बारिश के दिनों में अखबार में खबरें आती थी कि पिंडर घाटी बारिश से थर्रायी, कई सडकें बंद - वगरह, वगरह! करीब साढे चार बजे थराली पैट्रोल पम्प पर पहुंचा। मैंने पहले ही पता कर लिया था कि इस रास्ते पर अब थराली से आगे कोई और पैट्रोल पम्प नही पडेगा। इसलिए यहीं से टेंक फुल करा लिया। स्कूटी स्पेसली "ज्यूपिटर" के साथ एक यही समस्या है कि इसकी टंकी बहुत ही छोटी है। सिर्फ चार लीटर ही पैट्रोल आ पाता है हद मार के। हाँलाकि माइलेज अच्छा और पहाड पर भी यह 40-45 का एवरेज देती है। भाई टीवीएस वालों से गुजारिश है कि इसकी टंकी थोडी बडी की जाय। कम से कम छहः लीटर की तो कर ही दो यार !

खैर, थराली से वाण लगभग 50 किमी दूर है और चार लीटर पैट्रोल में तो इतनी दूर लगभग दो बार आना जाना कर देगी अपनी "ज्यूपिटर"। थराली से देवाल, मुंदोली होते हुए मैं करीब साढे पांच - पौने छहः बजे लोहाजंग पहुंचा। देवाल के बाद से यह रास्ता पिंडर नदी का साथ छोड देता है। यहाँ से पिंडर दांयी ओर मुडकर अपने उद्गम स्थल कुमाऊं के खाती गांव से उपर पिंडारी ग्लेशियर की तरफ चली जाती है - हाँ वही मतलब उधर से आती है देवाल की तरफ। मुंदोली से एक अंकल जी ने मुझसे लिफ्ट ले ली। बातों बातों में मैंने उनको बताया कि मैं अकेला रुपकुंड जा रहा हूँ तो बोले कि वहां तो आजकल बहुत भीड है। रहने और खाने की दिक्कत हो जायेगी। कोई लोकल को ले जाओ। मैंने कहा ठीक है लोहाजंग जाकर देखता हूँ क्या करना है। मैंने लोहाजंग पहुंचकर पता किया तो यहाँ भी यही बताया गया कि उपर काफी भीड है। बेदनी और भगुवाबासा में रुकने की दिक्कत आयेगी। अपना टेंट और स्लीपिंग बैग वगरह ले जाओ ताकि कोई दिक्कत ना रहे। बात भी सही थी इन लोगों की। वैसे तो मुझे पता था कि बेदनी, पत्थर नाचनी और भगुवाबासा तीनों जगहों पर ढाबे हैं। मगर अगर कहीं एक जगह भी रुकने की व्यवस्था नही मिली तो दिक्कत हो जायेगी। यही सोचकर मैंने एक पोर्टर कम गाइड कर लिया। जो अंकल मुंदोली से मेरी स्कूटी पर आये थे उन्होने ही अपने बेटे से बात करा दी। 600 रुपये प्रतिदिन प्लस खाना अलग से तय हुआ। साथ ही पास की एक दुकान से एक टेंट, दो स्लीपिंग बैग और गद्दे ले लिये गये। कुल मिलाकर तीनों चीजों का किराया 340 रुपये प्रतिदिन। अंकल जी और उनका बेटा गजेंद्र जो कि कल से मेरे साथ तीन-चार दिन की रुपकुंड यात्रा पर जाने वाला था, लोहाजंग से पांच किमी नीचे बांक गांव के रहने वाले थे। कल सुबह चलने की सारी तैयारी होने पर ये दोनों बाप-बेटे अपने घर के लिए निकल गये।

लोहाजंग में मैंने 100 रुपये का एक डोरमैट्री लिया। यहाँ से नंदाघुंटी चोटी साफ दिखायी दे रही थी। सामने वाले ढाबे पर खाना खाकर, थोडा बहुत टहलकर मैं आराम से सोने चला गया। अब बस कल सबेरे आराम से सात-आठ बजे निकलेंगे यहाँ से। स्कूटी से वाण तक जायेंगे और स्कूटी वहीं खडी करके ट्रैकिंग शुरू कर देंगे।

देवप्रयाग से पौडी, सतपुली और कोटद्वार और न जाने कहाँ - कहाँ जाने का रास्ता
लगता है संगम पर कुछ लोग अपने पाप धो रहे हैं !! हाँ मतलब स्नान कर रहे हैं भाई।

उपर मेन रास्ते से अलकनन्दा नदी में दिखता धारी देवी मंदिर
थोडा करीब से
जय मां धारी देवी
धारी देवी मंदिर के दूसरी ओर बैठे कुछ श्रधालु
नारायणबगड के पास पिंडर नदी
नारायणबगड के पास हुआ लैंड्स्लाइड और उसकी वजह से रोड ब्लॉक - बगल में खडी अपनी धन्नो आगे जाने के लिए ट्रक के हटने का इंतजार कर रही है।
बिस्तर पर चौधरी का सारा समान
लोहाजंग से दिखती नंदाघुंटी चोटी
लोहाजंग का मेन चौराहा
रुपकुंड, जुनार्गली और उससे आगे सुतोल तक का ट्रैक मैप

ट्रैकिंग हेतु नियम, शर्ते व प्रतिबंध

अगले दिन सुबह जूम लेंस के साथ फुल जूम करके लोहाजंग से लिया गया नंदाघुंटी का एक फोटो
अगले भाग में जारी.......

शुक्रवार, 23 जून 2017

केदारनाथ दर्शन और वापसी की यात्रा

इस यात्रा वृतांत को शुरूआत से पढने के लिए यहाँ क्लिक करें।
03 मई, दिन बुधवार
आज तीन मई है।आज केदारनाथ के कपाट खुलने हैं। हम लोग - मैं, मोनू, विकास और "पंडत" कल शाम ही केदारनाथ पहुंच चुके हैं और यहाँ स्थित गढवाल मंडल विकास निगम वालों की टेंट नगरी के एक टेंट में रुके हुए हैं। इस टेंट में हम चारों के अलावा तीन बंगाली लोग और तीन अन्य किसी राज्य से आये लोग भी रुके हैं जो सुबह हमारे जागने से पहले ही निकल गये थे। कपाट खुलने का समय सुबह आठ बजकर पचास मिनट है। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी भी कपाट ओपनिंग सिरेमनी में शामिल होने और मुख्य पूजा करने के लिए केदारनाथ आने वाले हैं। अतः जाहिर है कि सबसे पहले मोदी जी ही पूजा करेंगे और उनके वापिस जाने के बाद ही आम श्रधालुओं की बारी आयेगी। यही सोचकर हम लोग सुबह देर तक सोते रहे। यहाँ रात में नींद भी बढिया आयी थी क्योंकि एक तो सोलह किलोमीटर पैदल चलकर थके हुए थे और फिर सब लोग अपने-2 स्लीपिंग बैग में घुसे थे तो खर्राटों वाली समस्या यहाँ नही आयी।

वैसे तो हम चारों ही एक नम्बर के सोतू और आलसी हैं। फिर भी सबसे पहले सुबह सात बजे मेरी ही आंख खुली। बाकी के तीनों को जगाया तो जाग तो गये लेकिन आलस इतना कि कोई भी स्लीपिंग बैग से बाहर निकलने को तैयार नही। हमारे अलावा इस टेंट में जो अन्य लोग थे वो तो कब के जा चुके थे और एक हम थे कि हिलने तक को तैयार नही थे। हम चारों में हर कोई दूसरे को उठने को बोल रहा था। अबे उठो, अबे उठो - करीब एक घंटे तक यही सिलसिला चलता रहा तब जाकर कहीं हम अपने स्लीपिंग बैग्स से बाहर निकले वो भी तब जब उपर आसमान में हेलिकॉप्टर गडगडाने लगे। सबसे पहले "पंडत" अपनी कांचली (स्लीपिंग बैग का नामकरण विकास ने कांचली कर दिया था ) से बाहर निकला।

फिर बस जल्दी से हम चारो फ्रेश होकर बाहर आ गये। मोदी जी और अन्य वी आई पी लोगों के आने का समय हो चुका था। हमारे टेंट के थोडा सा सामने की ओर ही हेलीपेड था और हम कल से यही सोचे बैठे थे कि मोदी जी इसी हेलीपेड पर उतरेंगे। मगर जब उनका हेलीकॉप्टर सीधा मंदिर की तरफ निकल गया तो हमें समझ आया कि मंदिर के बगल में भी एक हेलीपैड है। यहाँ मौजूद सभी लोगों की तरह हम लोग भी मोदी जी से मिलना चाहते थे मगर शायद अब ये सम्भव नही था। मंदिर यहाँ से करीब आधा किलोमीटर दूर था और पूरे रास्ते के चप्पे-चप्पे पर पुलिस वाले तैनात थे जो किसी भी शख्श को आगे नही जाने दे रहे थे। आम लोगों को आज सुबह सात बजे के बाद से मंदिर की तरफ नही जाने दिया जा रहा था। ढाबे, दुकाने सब बंद थी। हाँलाकि उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज जी अपनी पत्नी के साथ हमारे सामने वाले हेलीपैड पर ही उतरे, मगर उनको भी पीछे के रास्ते से मंदिर की ओर ले जाया गया। खैर, जीएमवीएन वालों ने अपने ऑफिस के बाहर ही टीवी लगा रखा था। जिस पर डीडी न्यूज संवाददाता "अनुपम मिश्र" केदारनाथ मंदिर के अंदर से लाइव टेलीकास्ट कर रहे थे। हमारी तरह के काफी लोग जो मंदिर तक नही पहुंच पाए थे, यहाँ टीवी के सामने जमे थे।

पूर्व निर्धारित समय पर केदार बाबा के कपाट खुले। मंदिर प्रांगण में मोदीजी, उत्तराखंड के गवर्नर कृष्णकांत पॉल जी, पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज जी आदि "अति महत्तवपूर्ण" लोग दिखाई दे रहे थे। मुख्य पुजारी "रावल जी" ने मोदीजी से मुख्य पूजा कराई जिसके पश्चात मोदीजी वहां मोजूद लोगों से मिले - वो खुशनसीब लोग जो आज सुबह सात बजे के पहले-2 मंदिर तक पहुंच गये थे। वहां मौजूद एक आर्मी के जवान की बच्ची को पीएम साहब ने अपनी गोद में खिलाया, उससे बातें की और आशीर्वाद दिया। बस इतना लाइव टेलीकास्ट देखने के बाद हम लोग टीवी से सामने से हट गये। दरअसल हमें जोरों की भूख लगी थी और अभी-2 एक ढाबे वाले ने अपनी दुकान खोल दी थी। हम चारों सबसे पहले लपककर दुकान पर पहुंचे और चाय के साथ आलू के परांठों का ओर्डर दे दिया गया। मोदीजी करीब पंद्रह मिनट और केदारनाथ में रुके तथा जब हम नाश्ता कर रहे थे तब उनका हेलीकॉप्टर हमारे उपर से निकल गया। जोरों की भूख के बावजूद भी मुझसे एक परांठे से ज्यादा नही खाया गया। अब लोगों को आगे मंदिर तक जाने दिया जाने लगा। जल्दी से अपना नाश्ता निपटाकर हम लोग भी भोलेनाथ से मिलने को चल पडे।

मंदिर के रास्ते में हमें उत्तराखंड पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज अपनी पत्नी के साथ आते हुए मिले। वो शायद अभी जीएमवीएन के अधिकारियों के साथ मीटिंग करेंगे और यात्रा की तैयारियों का जायजा लेकर दोपहर बाद यहाँ से निकलेंगे। रास्ते में एक-दो जगह हम लोगों को केदारनाथ त्रासदी के निशान भी देखने को मिले। मंदिर के करीब पहुंचे तो देखा रास्ते के दोनो ओर भक्तों की लम्बी कतारें लगी थी। कम से कम मुझे आज पहले ही दिन केदारनाथ में इतनी भीड की उम्मीद नहीं थी। दोनो ओर कई-कई लाइनें बन रही थी। हम लोग बडे भोलेपन से एक लाइन में सबसे पीछे खडे हो गये। मगर करीब 20-25 मिनट बाद ही हमें ज्ञान हो गया कि भाई ऐसे तो शाम तक दर्शन होने से रहे। लोग साइडों से आगे जा रहे थे। दूसरी ओर तो पांच-पांच लाइन हो गयीं थी। "आंखिर क्या जुगाड है? " ये देखने के लिए मैं और मोनू आगे गये और एक जगह हिसाब सा देखकर एक साइड लाइन में खडे हो गये। विकास और "पंडत" को बोलकर आये ही थे कि हम ना आयें तो 10-15 मिनट में तुम लोग भी आगे आ जाना, सो थोडी देर बाद वो दोनों भी हमारे पास आ पहुंचे। बस अब तो हमारे आगे सौ सवा सौ ही लोग थे। इसी बीच दूसरी ओर भीड बेकाबू होने लगी और उन्होनें बांस-बल्ली की बैरिकेडिंग भी तोड डाली। सभी पुलिस वालों ने धीरे-2 पहले उन लोगों को आगे भेजा तब जाकर हम लोगों की आगे जाने की बारी आयी।

साढे बारह - पौने एक बजे के करीब हम लोगों ने केदारनाथ बाबा के दर्शन किये जिसके पश्चात मंदिर के पीछे स्थित हनुमान सिला देखी। केदारनाथ मंदिर के ठीक पीछे एक पत्थर की बहुत बडी शिला है। त्रासदी के समय ये शिला उपर से मलबे से साथ आयी थी और मंदिर के ठीक पीछे आकर लग गयी थी। इस शिला की वजह से ही मंदिर को कोई नुकसान नही हुआ था वरना आपदा तो इतनी भयानक थी कि शायद मंदिर को बहुत ज्यादा क्षति होती। इसी शिला को अब लोग हनुमान शिला के नाम से पूजने लगे हैं। यहाँ से उपर, पहाड की तरफ देखने पर सिर्फ पत्थर और मलबा ही दिख रहा था। मंदिर से करीब दो किलोमीटर उपर की ओर चोराबाडी ग्लेशियर है जो मंदाकिनी नदी का उद्गम स्थल है। मेरी योजना तो चोराबाडी तक जाने की थी मगर सभी के साथ चलना भी मजबूरी होती है। इसलिए बस भोलेनाथ के दर्शन करके ही हम लोग वापस लौट चले। जैसा कि ऊंचाई वाले पहाडी इलाकों में दोपहर बाद अक्सर होता है, हल्की-हल्की बारिश होना शुरू हो गयी थी। तेजी से हम लोग अपने टेंट पहुंचे और रेनकोट पहनकर भोलेनाथ की जय बोलकर अपनी वापसी की पैदल यात्रा शुरू की।

वापसी के समय कुछ भी परेशानी नही हो रही थी। लगभग पूरा ही रास्ता उतराई वाला है। करीब पौने दो घंटे में ही हम लोग छोटी लिनचोली पहुंच गये।बारिश थोडी तेज हो गयी थी और भूख भी जोरो से लग रही थी। सुबह के परांठे तो कब के पच चुके थे। रोटी सब्जी का बंदोबस्त तो यहाँ था नही बस चाय-मैगी और बिस्किट से ही काम चलाना पडा। करीब आधा घंटा छोटी लिनचोली में रुककर हम लोग आगे के रास्ते बढ चले। करीब 40 मिनट में भीमबली पहुंच गये। यहाँ वो डमरू वाले बाबाजी मिले जो केदारनाथ जाते समय मिले थे। वो यहाँ एक छोटे से हनुमान मंदिर में डेरा जमाये हुये थे। बाबा जी के पास भी हमने पांच मिनट का रेस्ट लिया। पांच से ज्यादा बज चुके थे और गौरीकुंड अभी भी छह किलोमीटर दूर था। आज दर्शन करने वाले श्रधालुओं में से अधिकतर वापस आ रहे थे और वो सभी लोग भी शायद गौरीकुंड में ही रुकेंगे। और इनके साथ-2 कल केदारनाथ जाने वाले यात्री भी आज रात को गौरीकुंड में ही स्टे करेंगे। इसलिये आज गौरीकुंड में कमरा मिलना मुश्किल से भी ज्यादा होग यही सोचकर हम लोगों ने फैंसला लिया कि जल्दी-जल्दी चलकर गौरीकुंड पहुंचते हैं और उसके बाद सोनप्रयाग या आगे के लिए निकल जायेंगे। बस फिर क्या था? हम लोगो ने गौरीकुंड की तरफ रेस लगा दी।

हल्का-हल्का दिन छिप सा गया था जब हम गौरीकुंड पहुंचे। सीधे पार्किंग स्थल पहुंचे जहाँ हमारी स्कूटी पिछले दो दिनों से हमारा इंतजार कर रही थी। हाँलाकि एक चाय का मन हो रहा था मगर टाइम नही था सो बिना देर किये आगे निकल लिये। सोनप्रयाग के रास्ते में ही पूरा अंधेरा हो गया था। सोनप्रयाग पहुंचे तो यहाँ भी बडी निराशा हुई। कहीं कोई कमरा नही मिल रहा था। बडी मुश्किल से काफी अंदर के एक होटल में 1000 रुपये का एक कमरा मिला। सिर्फ 4-5 घंटों में ही 16 किलोमीटर की पैदल यात्रा की थी। थकान तो हो ही गयी थी। बस डिनर किया और पड कर सो गये।

अगले दिन सुबह आराम से सोकर उठे। नाश्ता करके करीब पौने नौ बजे सोनप्रयाग से चले। जैसा मैंने अपनी पहली पोस्ट में बताया केदारनाथ यात्रा पर आते समय हम लोगों का प्लान था कि केदारनाथ-तुंगनाथ और बद्रीनाथ दर्शन करके चलेंगे। मगर "पंडत" को कल तक घर पहुंचना है इसलिए वो प्रोग्राम रद्द कर दिया था। मगर आज जैसे ही गुप्तकाशी से आगे कुंड के पुल पर पहुंचे तो मैंने स्कूटी तुंगनाथ की ओर मोड दी और थोडा सा आगे जाकर रुक गये कि चलो "पंडत" के थोडे से मजे लेते हैं। विकास और "पंडत" थोडा पीछे थे। विकास ने जैसे ही हमें उस ओर जाते देखा तो उसने भी अपनी स्कूटी उधर ही मोड दी। बल्कि वो तो काफी तेजी से आगे की तरफ निकल गया। "पंडत" पीछे से चिल्ला रहा था। "अबे, इधर कहाँ जा रहे हो। मेरे पास टाइम नही है। ड्रामा मत करो, वापस घर चलो।" खैर, थोडी देर "पंडत" के मजे लेकर हम वापस चल दिये। बस अब न जाने कब इधर आना हो!

हरिद्वार वापसी के रास्ते में हम लोग कुछ समय देवप्रयाग में रुके। यहाँ मंदाकिनी और अलकनंदा के संगम पर स्नान किया तो दो साल पहले की गयी तुंगनाथ यात्रा की याद ताजा हो गयी। तब भी हम लोग वापसी के समय यहाँ नहाये थे। आराम से शाम के आठ बजे तक हम हरिद्वार पहुंच गये। हमारी केदारनाथ यात्रा सफलतापूर्वक पूर्ण हो गयी थी। हालांकि तुंगनाथ और बद्रीनाथ नही जा पाये थे इसका अफसोस जरूर रहेगा। अपने बचपन के दोस्तों के साथ यात्रा करने में काफी आनंद आया। उम्मीद है ऐसी और यात्रायें आगे भी होंगी। आप सभी का बहुत बहुत आभार !!!


सुबह के समय केदारनगरी

सतपाल महाराज जी का हैलीकॉप्टर हमारे टेंट के सामने वाले हैलीपैड पर लेंड हो रहा है।

हैलीपैड पर खडा सतपाल महाराज का हैलीकॉप्टर

2013 त्रासदी के कुछ अंश अभी तक केदारनाथ में मौजूद हैं।

मोदी जी के जाने के बाद केदार दर्शन के लिए लगी भक्तों की लम्बी-2 कतारें



बस पहुंच ही गये हम लोग

जय बाबा केदार

केदारनाथ मंदिर के ठीक पीछे की तरफ का नजारा

यही वो हनुमान शिला है जो त्रासदी के समय मंदिर के पीछे आकर लग गयी थी और उस जलजले से मंदिर केदारनाथजी की रक्षा की थी।

आपदा के समय मंदिर के बांयी ओर वाले गेट में आयी दरार और उस पर लगी स्पोर्ट

दर्शन के पश्चात बाबा के धाम में अंतिम फोटो

वापसी के समय विकास और उसकी "मोर्चरी वाली पन्नी"

हरिद्वार वापसी के रास्ते में देवप्रयाग में संगम पर


इसी सब के साथ अथ श्री केदारनाथ यात्रा समाप्त। हर हर महादेव। 

रविवार, 28 मई 2017

केदारनाथ यात्रा: तीसरा दिन - गौरीकुंड से केदारनाथ

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2 मई, दिन मंगलवार 
सुबह छहः बजे से पहले ही मेरी आंख खुल गयी। आंख क्या खुली बल्कि रात भर ठीक से नींद ही नहीं आयी थी। मेरे बराबर में विकास तो दूसरी ओर मोनू के बगल में "पंडत" रात भर जम के खर्रांटे मारते रहे थे। मेरे साथ ये एक दिक्कत है कि अगर बगल में कोई खर्रांटे ले रहा हो तो मुझे नींद नही आती। और मुझे क्या शायद किसी को भी नहीं आती होगी। सुबह मेरे बाद मोनू उठा। उसका भी कुछ मेरे जैसा ही हाल था। फिर "पंडत" और विकास को जगाया गया। जब उन दोनों को उनके खर्रांटों के बारे में बताया तो पट्ठे मानने को तैयार नही कि वो खर्रांटे ले रहे थे, बोले कि यार हमें नी पता। खैर सबसे पहले मैं ही रजाई से बाहर निकला और फ्रैश होकर बाहर छत पर आ गया। रात को ये होटल यात्रियों से पूरा भर गया था मगर अब कुछ लोग हमारे जागने से पहले ही केदारनाथ के लिए कूच कर चुके थे। मैं बस बाहर टहल ही रहा था कि मैंने देखा कुछ लोग नीचे कहीं से नहाकर आ रहे हैं। उनसे पूछा तो पता चला कि तप्त कुंड के पास एक-दो पाइप से गर्म पानी आ रहा है। हाँलाकि मैं नहाने के मामले में थोडा कंजूस हूँ और यहाँ तो वैसे भी अच्छी ठंड थी। मगर मैं दो दिन से नहाया नही था और आगे भी एक दो दिन नहाने का कोई मतलब नही था। इसलिए मैं तुरंत अंदर आया और अपने साथियों को अपने इस साहसी विचार से अवगत कराया। लेकिन उन तीनों में से कोई भी नहाने के मूड में नही था। मैंने बोला कोई नी, तुम लोग जल्दी तैयार हो लो तब तक मैं नहा के आता हूँ, फिर जल्दी से निकलेंगे। तप्त कुंड के पास दो जगह पाइप में से गर्म पानी आ रहा था। पानी अच्छा खासा गर्म था, गात सा खुल गया नहाकर ! नाश्ते में एक-एक आलू का परांठा चाय के साथ निपटाकर करीब पौने आठ बजे हमनें अपनी केदारनाथ पैदल यात्रा शुरू कर दी। अभी तक डोली यहाँ से नही चली थी।

गौरीकुंड से केदारनाथ का पैदल ट्रैक करीब सोलह किलोमीटर का है और पूरा रास्ता पैदल चलने लायक पक्का बना हुआ है। 2013 से पहले ये रास्ता चौदह किलोमीटर का था और मंदाकिनी के बांयी ओर से जाता था। गौरीकुंड से केदारनाथ के आधे रास्ते में यानी सात किलोमीटर पर रामबाडा आता था जो इस पैदल यात्रा का सबसे मुख्य पडाव था। 2013 की त्रासदी में रामबाडा पूरी तरह से तबाह हो गया तो प्रशासन ने 2014 में एक नया रास्ता बनाया जो रामबाडा से थोडा पहले मंदाकिनी पार करके नदी के दांयी ओर वाली पहाडी के उपर से होता हुआ जाता है और 2014 के बाद से केदारनाथ का मुख्य रूट है।

गौरीकुंड - भीमबली - छोटी लिंचोली - लिंचोली - छानी केम्प - रुद्रा प्वाइंट - बेस केम्प - केदारनाथ

यात्रा के शुरुआती दिनों में ही बहुत ज्यादा भीड दिखायी दे रही थी। पूरे रास्ते पर यात्री ही यात्री दिखाई पड रहे थे।अधिकतर लोग पैदल थे तो काफी लोग खच्चरों पर और कोई-कोई कंडी में भी जाता दिख रहा था। शुरू में हम चारों साथ - साथ चल रहे थे। मगर जल्द ही एक साथ चलना मुश्किल होने लगा। जहाँ मोनू सबसे तेज चल रहा था वहीं "पंडत" सबसे पीछे था। बार-बार मोनू हमें तेज चलने को बोलता मगर हम सब अपनी - अपनी चाल से ही चल सकते थे। और सही भी यही था। एक-दो किलोमीटर के बाद ही हम सबको ये कहानी समझ में आ गयी। तभी तो मोनू सबसे आगे चला गया और हम तीनों अपनी-अपनी स्पीड से चलने लगे। रास्ते में बहुत से साधू लोग मिले इनमें से एक साधू डमरू बजाते हुए चल रहे थे, उनके पास खडे होकर फोटो खिंचाया। हम लोगों ने अपना टारगेट बनाया की छह किलोमीटर दूर भीमबली में ही पहला स्टॉप लेंगे और वहां 15-20 मिनट रुक कर चलेंगे। भीमबली तक का पूरा रास्ता हल्की - हल्की चढाई वाला ही है। आराम से चलते हुए भी करीब सवा दो घंटे में हम भीमबली पहुंच गये।

भीमबली की समुद्र तल से उंचाई 2670 मीटर है। मोनू हमें यहाँ नही मिला, न जाने वो यहाँ रुका भी था या नही। भीमबली में 10-15 मिनट का ब्रेक लेकर हम लोग आगे निकल गये।  रामबाडा से थोडा पहले दो जगहों पर रास्ता मंदाकिनी नदी को पार कर रहा था। पहले वाले पुल से जाने वाला रास्ता थोडा लम्बा था जबकि दूसरे पुल वाला रास्ता थोडा छोटा था मगर उस पर तेज चढाई थी। हमने छोटे रास्ते से जाने का विचार किया। पुल पर दो-चार फोटो खींचकर चढाई वाले रास्ते पर मैंने अपने कदम बढा दिये। विकास और "पंडत" पुल पर थोडा और आराम करना चाहते थे जबकि मोनू कब का आगे निकल चुका था। यहाँ से छोटा लिंचोली करीब डेढ-पौने दो किलोमीटर है और वहां तक चढाई वाला रास्ता है। अब मुझे भूख भी लगने लगी थी। अपनी चाल से चलता हुआ करीब ग्यारह बजे तक मैं छोटी लिंचोली पहुंच गया। यहाँ दूर से ही एक चबूतरे पर मुझे मोनू बैठा दिख गया। भूख जोरों पर थी जाते ही बिस्किट और कोल्ड-ड्रिंक ले ली गयी। 10-15 मिनट के बाद "पंडत" और विकास भी आ गये। जब हम चारों यहाँ बैठकर खा पी रहे थे तब जाकर केदारबाबा की डोली नीचे से आयी। थोडी देर यहाँ रुककर डोली आगे निकल गयी जबकि हम थोडा और रुककर चले।

करीब पौने बारह बज रहे थे जब हम छोटी लिनचोली से चले। यहाँ से लिनचोली करीब ढाई किलोमीटर जबकि केदारनाथ साढे सात किलोमीटर है। विकास और मोनू ने अपना सामान एक ही बैग में रख रखा था जिसे गौरीकुंड से यहाँ तक मोनू लेकर आया था। अब उस बैग को ढोने की बारी विकास की थी जबकि मैं और "पंडत" अपना-अपना बैग लिए हुए थे। छोटी लिनचोली से निकलते ही मैं और मोनू आगे निकल गये। विकास और "पंडत" को बोल दिया कि आगे कहीं किसी पडाव पर हम उनको मिलेंगे। एक बजे के करीब लिनचोली पहुंचे। ज्यादा देर यहाँ रुके नही। एक किलोमीटर आगे छानी कैम्प में रुके। एक दुकान पर चाय मैगी का ऑर्डर दे दिया। और दुकान के बाहर आकर बैठ गये ताकि विकास और "पंडत" आयें तो हम उन्हे यहीं रोक लें। हमनें अपनी मैगी और चाय निपटा ली तब जाकर विकास और "पंडत" यहाँ पहुंचे। उन दोनो के लिए चाय - मैगी का ऑर्डर देकर मैं और मोनू आगे के लिए निकल लिये ताकि हम जल्दी पहुंचकर आज के रहने खाने का कुछ इंतजाम कर सकें।

छानी कैम्प के बाद जगह-जगह पानी के रास्तों में बर्फ मिलने लगी। एक जगह तो अभी भी मजदूर बरफ हटाकर रास्ता बना रहे थे। छानी कैम्प से रुद्रा प्वाइंट और आगे केदारनाथ बेस कैम्प तक का रास्ता चढाई भरा है। जैसे - जैसे हम आगे बढते जा रहे थे, बर्फ से ढंके पहाड हमारे और करीब आ रहे थे। आंखिर की एक किलोमीटर वाली चढाई काफी कठिन थी मगर फिर भी धीरे-2 हम बेस कैम्प तक पहुंच ही गये। यहाँ के बाद केदारनाथ लगभग एक किलोमीटर रह जाता है और रास्ता भी सीधा ही है। खच्चर सिर्फ बेस कैम्प तक ही आते हैं। इसके बाद सभी को केदारनाथ तक पैदल ही जाना होता है। इन खच्चरों ने रास्ते भर बडा परेशान किया था, वो तो भला हो "सुलभ" वालों का जो पूरे रास्ते पर सफाई कर रहे थे नही तो पूरा रास्ता इन खच्चरों की लीद से पट जाता। अब कम से कम कल तक के लिए इन खच्चरों से पीछा छूटा। बेस कैम्प से केदारनाथ सामने ही दिखता है, ये देखकर हमारी थकान कुछ मिट सी गयी। अब हल्की-हल्की बूंदा बांदी भी होने लगी थी मगर फिर भी हम लोग रुके नही और शाम के चार बजने से पहले ही केदारनाथ पहुंच गये। यहाँ पहुंचते ही हमारा सबसे पहला काम था रहने के लिए जगह ढूंढना जिसके लिए हमें बहुत ज्यादा मेहनत नही करनी पडी। केदारनाथ मंदिर से करीब 150-200 मीटर पहले ही जीएमवीएन वालों ने एक पूरी टेंट कॉलोनी बसा रखी थी। एक टेंट में 10 आदमियों के रुकने की व्यवस्था थी और किराया था 250 रुपये प्रति व्यक्ति जो शायद थोडा ज्यादा था। मगर ज्यादा ऑप्शन ना होने की वजह से एक टेंट में चार लोगों के हिसाब से पर्ची कटाई गयी और जा पटका अपना बैग।

करीब 20-25 मिनट के बाद "पंडत" और विकास आते हुए दिखे, उनके लिए मैं और मोनू पहले ही टेंट के बाहर आ गये थे। हम चारों जैसे ही अपने आज के आशियाने में पहुंचे तो सबसे पहला काम जूते निकालकर स्लीपिंग बैग में घुसने का ही किया गया। हाँलाकि अभी दिन छिपनें में काफी समय था मगर बाहर बादल होने की वजह से मौसम में बेहद ठंड थी उपर से हमारे शरीर में आया पसीना सूख रहा था तो और भी ज्यादा ठंड लग रही थी। स्लीपिंग बैग में घुसने के भी करीब 15-20 मिनट बाद ठंड दूर हुई। आंखिर आज अपनी 16 किलोमीटर की पैदल यात्रा 8 घंटे में पूरी करके हम समुद्र तल से करीब 3500 मीटर की उंचाई पर स्थित इस केदारनगरी में पहुंच गये। सभी को हल्के सर दर्द की शिकायत सी  महसूस हो रही थी जो शायद हाई एल्टिट्यूड का असर था। अब करना तो कुछ था नही तो बस अंधेरा होने तक पडे रहे टेंट में ही। दो-तीन घंटे बाद करीब साढे सात बजे बाहर थोडा बहुत टहलकर और हल्का-फुल्का डिनर कर के हम लोग फिर से अपने टेंट में सोने के लिए चले गये। आज का दिन पूरा हुआ बस अब सुबह भोले बाबा के दर्शन करने की बारी थी।

मंदाकिनी और गौरीकुंड से पैदल यात्रा की शुरूआत

इस फोटो में जो सबसे पीछे भीड सी दिख रही है, वहीं गौरीकुंड का अंतिम छोर है जहाँ से केदारनाथ की पैदल यात्रा शुरू हो रही है।

मोनू और विकास

बम बम भोले - ये डमरू वाले साधू जी डमरू बजाते और भोलेनाथ का जयकारा करते चल रहे थे। "पंडत" आशीर्वाद ले रहा है।

अब चौधरी साब की बारी आशीर्वाद लेने की

भीमबली से करीब एक -डेढ किलोमीटर पहले मिला एक झरना

लो जी, भीमबली में वाइ-फाइ जोन भी है। इसे कहते हैं हाइटेक जमाने की केदारनाथ यात्रा !!

भीमबली से दूरियां
क्या कहेंगे विकास के इस पोज को!!

"पंडत" अब थोडा ठीक सा लग रहा है। शुरू के चार-पांच किलोमीटर में तो ये बुरी तरह टूट लिया था।

रामबाडा से थोडा पहले मंदाकिनी पार कर दूसरी ओर जाता रास्ता। यहाँ करीब 100-150 मीटर की दूरी पर दो जगह मंदाकिनी नदी पर पुल बने हैं और उनसे होकर केदारनाथ ट्रैक नदी के दायीं ओर वाली पहाडी पर जाता है।

रामबाडा के पास मंदाकिनी पर बना पुल

यहीं पर कहीं रामबाडा था जो 2013 में पूरी तरह तबाह हो गया था।

रामबाडा के पास नदी पार करने के बाद उपर चढता रास्ता

दुख के दो साथी

बर्फ के गोले दिखाता विकास

लिंचोली के बाद मिली पहली बर्फ पर चौधरी साब

रास्ते में मिली पहली बर्फ पर मोनू

लिंचोली से दूरियां

छानी कैम्प के बाद एक जगह बर्फ हटाकर रास्ता बनाते मजदूर



मंदाकिनी के उस पार पुराना क्षतिग्रस्त केदारनाथ ट्रैक और उस पर हुआ भूस्खलन

मुस्कुरायें आप हिमालय की गोद में हैं। मगर ऐसी थकान में मुस्कुरायें कैसे भाई?!!

केदारनगरी स्थित टेंट्स
शाम के सवा चार बजे हैं। विकास और "पंडत" भी आ पहुंचे हैं केदारनगरी!
जीएमवीएन के टेंट में अपने-2 स्लीपिंग बैग में घुसे हुए

अगले दिन सुबह केदार बाबा के दर्शन के पश्चात
अगले भाग में जारी.....