मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

रुपकुंड से वापस हरिद्वार -बद्रीनाथ होते हुए

04 अक्टूबर, 2017
इस यात्रा वृतांत को शुरु से पढनें के लिए यहाँ क्लिक करें।
आली बुग्याल समुद्रतल से करीब 3450-3500 मीटर की उंचाई पर स्थित बहुत ही सुंदर बुग्याल है। सुंदरता के मामले में आली, बुग्याल बेदनी से भी काफी आगे है। बेदनी में जहाँ भीड और गंदगी दिखती है वहीं आली में खूबसूरत मखमली घास,सुंदर ढलान और उसके नीचे खत्म होती ट्री लाइन अर्थात वृक्षरेखा - जैसा फिल्मों में दिखाते हैं एकदम वैसा ही दिखता है आली। कल शाम हम रुपकुंड देखकर आली आ गये थे। यहाँ बुग्याल के शुरुआत में ही एक ढाबा है। हमने इसी ढाबे के पास अपना टेंट लगाया था। कल शाम अधिक थके होने के कारण हम लोग अपने टेंट में ही आराम करते रहे। रात को डिनर के समय आज का प्लान बनाया गया। आली बुग्याल से वापस आने के दो रास्ते हैं। पहला रास्ता सीधा आली पार करके तोलपानी-दीदना होते हुए कुलिंग गांव जाता है। गौरतलब है कि कुलिंग लोहाजंग वाण रास्ते पर लोहाजंग से करीब 4-5 किमी आगे है। अर्थात इस रास्ते से दीदना-कुलिंग होते हुए सीधे लोहाजंग पहुंचा जाता है। दूसरा रास्ता आली बुग्याल के शुरुआत में ही नीचे उतरकर जंगल के रास्ते से होता हुआ गैरोली पाताल में बेदनी बुग्याल - वाण वाले रास्ते पर मिलता है। चुंकि मैं अपनी स्कूटी वाण में खडी करके आया था तो चाहकर भी हम दीदना वाले रास्ते पर नही जा सकते थे। इसलिए तय किया कि सुबह आराम से आली भ्रमण करके नौ बजे तक निकलेंगे।

अगले दिन सुबह मैं सात बजे तक सोता रहा। एक तो दिन भर के थके थे, दूसरे आली भगुवाबासा से काफी कम ऊंचाई पर है और यहाँ बेदनी की तरह भीड-भाड, शोर शराबा भी  नही है तो रात में जबरदस्त नींद आयी थी। फ्रैश होकर चाय पीने के बाद मैं आली की खूबसूरती अपने कैमरे में कैद करने निकल लिया। अभी कुछ दिन पहले ही मैंने कैमरा खरीदा है -कैनन 1300 D. अभी ठीक से चलाना भी सीखना है। इसीलिए इस ट्रैक पर इतने अच्छे फोटो नही खींच पाया। आली बुग्याल ऐसी जगह स्थित है जहाँ से  त्रिशुल और नंदाघुंटी भी दिखती हैं, वाण भी दिखता है और दीदना व कुलिंग भी दिखायी पडते हैं। सुबह के समय मौसम साफ होने की वजह से दूर चौखम्भा, केदारनाथ, नीलकन्ठ समेत अनेकों बर्फीली चोटियां तक साफ दिखायी दे रहीं थी। करीब आधे-पौने घंटे तक मैं आली बुग्याल की सुंदरता का आनंद लेता रहा -आंखिर में जब गजेंद्र ने आवाज दी कि सर आ जायिए नास्ता तैयार  हो गया है तब मैं वापस ढाबे पर आया। आलू परांठा और चाय का नास्ता करके करीब पौने नौ बजे हम लोग आली से निकल लिए।

आली से गैरोली पाताल के लिए रास्ता हमारे ढाबे के पास से ही नीचे उतरकर जंगल से होता हुआ जाता है। ये जंगल काफी घना है लेकिन जंगली जानवर कम ही हैं। यहाँ बहुत बडे पैमाने पर जंगली जानवरों का शिकार होने के कारण अधिकतर जानवर दूर के जंगलों में चले गये हैं। गैरोली पाताल तक के 3-4 किमी के रास्ते में हमें एक भी जानवर नही दिखा। हम गैरोली में बिना रुके ही निकल गये। अब हम ट्रैकिंग के हाइवे पर आ चुके थे तो हमने भी अपनी रफ्तार पकडी और सीधे वाण जाकर ही थमें। हाँ रणकाधार में थोडी देर जरूर रुके थे। यहाँ आइडिया का फुल सिग्नल आ रहा था। अपने गांव वाले दोस्तों को फोन किया तो पता चला वो लोग आज गंगोत्री से वापिस आ रहे हैं और अभी उत्तरकाशी से आगे आ चुके हैं। आज वो लोग श्रीनगर के आसपास कहीं रुकेंगे और कल बद्रीनाथ जायेंगे। इधर मैं भी आज कम से कम थराली तक पहुंच ही जाउंगा। थराली से कर्णप्रयाग करीब 45 किमी दूर है जबकि श्रीनगर से करीब 64 किमी है। इसलिए तय किया कि तुम लोग पहुंचो मैं तुम्हे कल सुबह 10 बजे तक कर्णप्रयाग में मिलता हूँ। बद्रीनाथ साथ में ही चलेंगे।

एक बजे के करीब हम वाण पहुंचे। यहाँ  10 मिनट आराम करके बाइक (स्कूटी) उठाई और लोहाजंग के लिए निकल लिए। लोहाजंग में टेंट और बाकी सामान वापिस किया और गजेंद्र का हिसाब करके उसे भी विदा किया। यहाँ गजेंद्र और बाकी लोगों की एक बात मुझे बहुत बुरी लगी। हम लोगों ने चार दिन में रुपकुंड ट्रेक किया था और 600 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से गजेंद्र का 2400 रुपये बनता था। लेकिन जब मैंने उसे 2500 रुपये दिये तो पट्ठा बोला के 3600 रुपये लुंगा। चाहे आप ट्रैक कितने भी दिन में करो हम लोग तो छह दिन के हिसाब से ही पैसे लेते हैं। टेंट वाला और उसकी दुकान पर बैठे 1-2 लोग भी  उसे सपोर्ट करने लगे। मुझे बडा बुरा लगा। मैंने कहा यार जब मैंने तुम्हे क्लीयर बोला था कि मैं 600 प्लस खाना प्रतिदिन के हिसाब से दुंगा तो तुमने उस समय नही बोला कि मैं कम से कम छह दिन का पैसा लुंगा। थोडी बहुत कहा सुनी भी हुई इस मामले में, लेकिन मैंने अब उसे सिर्फ 2400 रुपये ही दिये। और अंत में इस ट्रैक से ये एक कडवी याद लेकर लौटा।  इसके तुरंत बाद मैं लोहाजंग से निकल लिया और शाम के साढे पांच बजे तक अंधेरा होने से पहले ही थराली पहुंच गया। थराली पिंडर नदी के तट पर स्थित है। यहाँ 350 रुपये में बडे आराम से एक कमरा मिल गया गीजर,टीवी के साथ। आज कईं दिनो बाद टीवी देखने में बडा आन्नद आया। आराम से खाना वाना खाकर मोनू लोगों को फोन करा तो पता चला पट्ठे अभी भी चल रहे हैं और 8-9 बजे तक श्रीनगर पहुंचेंगे। सुबह साढे छह बजे तक निकलना है ऐसा तय करके मैं अपने रुम में जाकर सो गया।

अगले दिन सुबह करीब सवा सात बजे मैं थराली से चला। उससे पहले स्कूटी की टंकी फुल करा ली। मोनू,विकास लोग मुझसे 20-25 मिनट पहले ही निकल लिए थे। रात वो लोग श्रीनगर से दो किमी पहले कीर्तिनगर में रुके थे। रास्ता खराब था तो मुझे कर्णप्रयाग पहुंचने में पौने दो घंटे लग गये। यहाँ अलकनंदा-पिंडर संगम के पास एक तिराहे पर मुझे ये लोग मिल गये। मोनू, विकास,पंडत और इनके साथ मवाना का एक लडका और था। एक बार फिर से हमारी केदारनाथ वाली मंडली हो गयी। कर्णप्रयाग में ही आलू परांठा और चाय का नाश्ता करके 10 बजे के आस-पास हम लोग बद्रीनाथ के लिए रवाना हुए। प्लान किया कि अगर समय रहा तो 'माणा' तक जायेंगे। मगर अनंत: ऐसा न हो सका और हम बद्रीनाथ से ही वापस लौट आये। जोशीमठ से थोडा पहले हेलंग के पास वृद्ध बद्री के दर्शन किये और करीब दो बजे हम जोशीमठ पहुंचे। यहाँ से बाइपास वाला रास्ता पकडा और बिना रुके निकल गये। हाँ,जोशीमठ बाइपास पर एक जगह हमें भगवान राम की शोभायात्रा मिली।  शायद उत्तराखंड के पहाडों में दशहरे के बाद इस तरह के उत्सव मनाये जाते हैं। खैर जोशीमठ के अंत में ही एक पैट्रोल पम्प से हमनें तेल लिया क्योंकि इसके बाद आगे कोई पम्प नही है और वापिस इसी पम्प पर तेल मिलेगा।

जोशीमठ से बद्रीनाथ करीब 45 किमी रह जाता है। आगे का रास्ता विष्णुप्रयाग, गोविंदघाट, पांडुकेश्वर, हनुमानचट्टी होते हुए जाता है। विष्णुप्रयाग में धौलीगंगा (विष्णणुगंगा) और अलकनन्दा का संगम है। यहीं जेपी ग्रुप का एक हाइड्रो प्रोजेक्ट चल रहा है। गोविंदघाट में अलकनंदा पार करके एक रास्ता सुप्रसिद्ध फूलों की घाटी और हेमकुंड साहिब के लिए जाता है। काफी मन है उधर जाने का, हो सकता है अगली बार फूलों की घाटी और हेमकुंड साहिब का ही नम्बर हो।  पांडुकेश्वर एक काफी बडा कस्बा है और यहाँ योगध्यान बद्री मंदिर भी स्थित है। पांडुकेश्वर के बाद रास्ता काफी खराब है जबकि हनुमानचट्टी के बाद तो कई जगह भूस्खलन हो रखा है। हाँ, आंखिरी के 7-8 किमी का रास्ता अभी बना है और एकदम शानदार है। करीब सवा चार बजे हम बद्रीनाथ पहुंचे। बद्रीनाथ भी काफी बसा हुआ है। और यहाँ एक पुलिस थाना भी है। किसी एक बडे से कस्बे जैसा दिखता है बद्रीनाथ। बद्रीनाथ मंदिर के एक पास में ही तप्त कुंड है जहाँ सदैव गर्म पानी रहता है। पांच से उपर का समय हो चुका था और अब माणा जाने का मतलब था कि आज हमें वहीं रुकना पडेगा। जबकि हम आज ही जोशीमठ तक वापस पहुंचना चाहते थे जिससे कल आराम से शाम तक हरिद्वार पहुंच सके। बस हाथ-पैर धुलकर, बद्रीनाथ जी के दर्शन करके प्रसाद खाया और 2-4 फोटो लेकर वापसी की राह पकडी। सात बजे जोशीमठ पहुंचे। एक होटल में रुम के लिए पता किया तो किराया 2500-2800 रुपये बताया गया। हमें तुरंत समझ आ गया कि ये जगह हमारे रुकने के लिए नही है। रात का समय था फिर भी हम आगे बढ चले और 7-8 किमी आगे आकर एक हाइड्रो साइट के पास एक होटल में पांच लोगों के लिए 800 रुपये में एक कमरा लिया। दिन भर के भूखे थे तो दबा के खाना खाया और पडकर सो गये। अगले दिन सुबह 8 बजे यहाँ से चले और शाम के 7 बजे तक आराम से हरिद्वार पहुंच गये।

एक और यात्रा पूरी हुई। आंखिर के दो दिन गांववाले दोस्तों के साथ खूब मजा आया। "पंडत" काफी टाइम से सतोपंथ ताल जाने के लिए कह रहा है। भगवान जाने वो वहां कौन सी स्वर्ग-सीढी देखना चाहता है? शायद अगले साल वहां जाना हो। खूब मजा आयेगा।

जय श्री बद्री-विशाल !!!!

आली की खूबसूरती 

आली बुग्याल में हमारा टेंट

सुबह की धूप में आलस

आली की खूबसूरती 

ओली (जोशीमठ) की तरह ही आली में भी बहुत सुंदर ढलान मौजूद है जहाँ सर्दियों में बर्फ पर विंटर गेम्स  आयोजित किये जा सकते हैं। मगर विडम्बना है कि आज तक इस ओर हमारी किसी सरकार ने कोई तवज्जो नही दी  है।  

नए -2 फोटोग्रफर की एक अच्छी फोटो



दूर सामने वाली पहाडी पर भेडों का झुंड 
सुंदर आली



बेदनी बुग्याल से आली आता हुआ रास्ता। ठीक सामने वो ढाबा और हमारा टेंट दिख रहे हैं। 
एक और फूल का क्लोजअप लेने की कोशिश 

आली से दिखता वृहद हिमालय - दांये नीलकंठ, बीच में राजा चौखंबा, और बांयी ओर केदारनाथ (इतनी ही चोटियों को पहचानता हूँ मैं इनमें से ) 

सामने वाण गांव दिख रहा है। 

आली का ढलान और उसके नीचे खत्म होती ट्री-लाइन

शायद घास पर पडी ओस का फोटो खींचने का प्रयास किया है। 

वापसी के समय नीलगंगा में कुछ लोग मटरगस्ती कर रहे हैं। 

ये मोबाइल से लिया है। 

राजमा के खेत

हेलंग के पास ऊनीमठ गांव में वृद्ध-बद्री

बद्रीनाथ में अलकनंदा 

जय श्री बद्रीनाथ 


भगवान की पूजा की रेट लिस्ट !
आप सभी का बहुत बहुत आभार!!!


सोमवार, 20 नवंबर 2017

रुपकुंड ट्रैक: भगुवाबासा से रुपकुंड और वापस आली बुग्याल

03 अक्टूबर, 2017
इस यात्रा वृतांत को शुरु से पढनें के लिए यहाँ क्लिक करें।
तीन अक्टूबर की सुबह करीब पौने पांच बजे मैं सोकर उठा। असल में भगुवाबासा ज्यादा ऊंचाई पर होने के कारण रात में ठीक से नींद ही नही आयी थी। बार - बार आंख खुल जाती, मैं मोबाइल में देखता कि कितना समय हुआ है और सुबह के इंतजार में फिर से सोने की कोशिश करता। आंखिरकार पौने पांच बजे मैं उठ गया। थोडी देर तक टेंट में ही अपने स्लीपिंग बैग में बैठा रहा। बाहर देखा कुछ लोग जगे हुए हैं, ढाबे वाले भी जाग गये हैं। यहाँ यूथ होस्टल वालों का 8-10 लोगों का एक ग्रुप था, 4-5 बंदे और थे और मैं था। टोटल 17-18 लोग हम आज रुपकुंड जाने वाले थे। मैं अपने टेंट से निकलकर बगल वाले ढाबे पर पहुंचा। गजेंद्र के बारे में पूछा तो पता चला वो रात इस ढाबे पर नहीं सोया किसी दूसरे ढाबे वाले के यहाँ है। खैर थोडी देर ढाबे वालों से मगजमारी करी तब तक गजेंद्र भी आ गया। फैश होकर और चाय-पारले जी का नाश्ता करके करीब पौने छह: बजे हम लोग रुपकुंड के लिए निकल लिए। सारा सामान यहीं टेेंट में ही छोड दिया बस कैमरा और पानी की बोतल साथ ले ली। यूथ होस्टल वालों का ग्रुप भी हमारे साथ ही निकला जबकि बाकि के 4-5 लोग हमसे करीब बीस मिनट पहले निकल गये थे।

भगुवाबासा से रुपकुन्ड लगभग तीन किमी है जिसमे आधा रास्ता तो हल्की हल्की चढाई वाला है जबकि आंखिर के डेढ किमी का रास्ता काफी चढाई वाला और जानलेवा है। इस पूरे रास्ते में खडी चढाई है जो कि पत्थरों - चट्टानों के चूरे के उपर से जाता है। शुरुआत के आधे किमी के सफर में अंधेरा था और हमें टोर्च जलाकर बडी सावधानी से चलना पड रहा था। कल बेदनी से जो ग्रुप हमारे साथ आया था उनके टेंट्स भगुवाबासा से करीब 100-150 मीटर आगे लगे हुए थे। और वो लोग भी आज ही रुपकुंड जायेंगे लेकिन जब हम उनके पास से गुजरे तो उनमें से कुछ लोग जगे थे उन्होने बताया कि उनका आज सात बजे निकलने का प्लान है और रुपकुंड देखकर शाम तक वो लोग बेदनी बुग्याल या पत्थर नाचनी पहुंचेगे। आधे रास्ते जाने पर एक ढाबा मिला। अब तक सूरज निकल आया था लेकिन ठंड अभी भी अपने चरम पर ही थी। ढाबे के आस-पास पडी ओस की बूंदे जम गयी थी और हर जगह पाला जैसा पडा हुआ था। यहाँ हम लोगो ने चाय पी और कुछ देर आराम किया गया। यहाँ भी एक बंदे को एल्टिट्यूड सिकनेस हो गयी थी तो उसे इसी ढाबे वाले के पास रुकने के लिए छोड दिया।

ढाबे से आगे निकलते ही खडी चढाई शुरु हो गयी और थोडी ही देर में समझ आने लगा कि क्यों इस एक- डेढ किमी के हिस्से को रुपकुंड यात्रा का कठिनतम भाग कहा जाता है। पिछले साल की गयी श्रीखंड महादेव यात्रा के आंखिरी दिन की यात्रा की याद ताजा हो गयी जब हम लोग पार्वती बाग से श्रीखंड गये थे तो वो रास्ता भी लगभग ऐसा ही था पत्थर और चट्टानों का चूरा और समुद्रतल से उंचाई 4200 मीटर से उपर ! हाँलाकि उसमें तो बारिश होने की वजह से थोडी फिसलन भी थी कम से कम इधर ऐसा तो नही था। जैसे - जैसे हम लोग उपर चढते जा रहे थे ग्रुप मेंम्बर कम होते जा रहे थे। मतलब कुछ लोगों का ज्यादा बुरा हाल था वो एक-दो कदम चलते और फिर 5-7 मिनट रुकते जिसकी वजह से वो पीछे छूट जा रहे थे। खैर धीरे धीरे चलते हुए हमने ये कठिन रास्ता भी पार कर लिया और करीब सात पचास पर मैं रुपकुंड पहुंच गया। हमारे साथ चले बाकि के लोग अभी पीछे ही थे जबकि जो 4-5 बंदे हमसे बीस -पच्चीस मिनट पहले चले थे वो लोग मुझसे बस थोडी ही दूर थे मगर वो अब जुनारगली की चढाई कर रहे थे।

रुपकुंड ----- 4850 मीटर के करीब उंचाई! मेरे बिल्कुल ठीक सामने थोडा नीचे एक बडे से गड्डे के रुप में है जिसके तीन तरफ खडी चट्टाने हैं जिनसे लगातार पत्थर और मलबा झील में गिरता रहता है। झील के दांयी ओर से रास्ता पहाड के उपर चढकर जुनारगली दर्रे तक जाता है। रुपकुंड के पास अभी धूप नही आयी है। मेरा पोर्टर गजेंद्र करीब 100 मीटर दूर धूप में ही रुक गया है और मैं यहाँ अकेला हूँ। मुझे थकान हो रही है तो मैं थोडी देर के लिए बगल में बने एक चबूतरे जैसी जगह पर बैठ जाता हूँ। मेरे बगल में ही एक छोटा सा मंदिर है जिसमें भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्तियां रखी हैं। दूसरी ओर एक अन्य चबूतरे पर कुछ कपाल और बहुत सारी हड्डियां रखी हैं। इन्ही हड्डियों को देखने मैं यहाँ आया हूँ। सामने नीचे झील की ओर देखता हूँ। झील में थोडा सा पानी दिख रहा है जो शायद आधा जमा हुआ भी है और किनारे-किनारे थोडी सी ठोस बर्फ भी दिखायी दे रही है। झील के आसपास और उसके अंदर भी काफी हड्डियां हैं जो मुझे बाद में झील पर जाने पर दिखायी दी। यहाँ हवा में ऑक्सीजन की कमी साफ महसूस की जा सकती है। यहाँ थोडी देर आराम करने के बाद मैंने कपाल, हड्डियों, मंदिर और आसपास के कुछ फोटो लिये। भारतीय पुरातत्व विभाग के अनुसार ये मानव कंकाल और हड्डियां करीब एक हजार साल से भी ज्यादा पुरानी हैं मगर ये तो आज भी ऐसी ही लगती हैं जैसे बस कुछ ही सालों पुरानी हों।

थोडे बहुत इधर उधर के फोटो खिंचने के बाद मैं नीचे झील के तल पर गया। अभी भी मैं यहाँ अकेला ही था और सच बताऊं तो हल्का हल्का अजीब सा डर भी लग रहा था। झील के आस पास भी चारों ओर हड्डियां बिखरी पडी थी। एक चश्मा और एक कंघा भी वहां पडा दिखा जो शायद आज के युग के ही आदमी का था। झील में काफी पानी था जो आंशिक रुप से जमा हुआ था। झील के तीन ओर सीधे खडे पहाडों को पूरी गर्दन उठा कर देखना पड रहा था। ऐसा लग रहा था मानों अभी ये चट्टानें मेरे उपर आ गिरेंगी। यहाँ भी कुछ देर झील और उसके आसपास के फोटो लिए। इसी बीच उपर मंदिर के पास से कुछ आवाज सी आयी तो देखा वहां यूथ होस्टल वाले ग्रुप का गाइड और 3-4 लोग थे। अब जाकर ये लोग यहाँ पहुंचे हैं। फोटो खींचकर मैं बाहर आया तो वो यूथ होस्टल वालों का गाइड बोला "आगे नही जओगे क्या?" मैंने कहा "आगे कहाँ"। वो बोला "जुनारगली तक जाइए वहां से त्रिशुल और नंदाघुंटी का व्यू बहुत अच्छा है और आप तो बढिया आये हो आराम से चले जाओगे।" मैंने कहा "तुम लोग जाओगे क्या?" "नही ,हमारा तो बस रुपकुंड तक का ही है। हम लोग आगे नहीं जायेंगे।" मै बोला "मैं भी नही जा रहा, अभी वापिस भी जाना है और आज शाम तक आली भी पहुंचना है।" सही बताऊं तो अब मेरे दो मन हो रहे थे। एक कह रहा था चल यार उपर जुनारगली तक चलते हैं थोडी ही तो चढाई है। तो दूसरा मन कह रहा था कि भाई उपर तक जाने में हालत खराब हो जानी है और आने-जाने और वहां रुकने में 2 घंटे लग जायेंगे जिससे शायद हम आज आली ना पहुंच पाएं। उपर से गजेंद्र भी 100 मीटर पीछे ही बैठ गया था अगर वो भी साथ होता तो शायद फिर भी चले जाते। इसी सोच के साथ आंखिरकार मैंने फाइनल निर्णय किया कि बस वापस चलता हूँ। मगर वापस आने पर मुझे लगा कि गलती कर दी भाई तुने। इतने करीब होने पर भी जुनारगली नही गया। अब न जाने कभी इधर आना होगा भी या नही। जाना चाहिए था।

मैं वापस आकर गजेंद्र के पास बैठ गया और थोडी देर धूप सेकने के बाद करीब साढे नौ बजे हम लोग वापस लौट चले। वापसी के रास्ते में हमें काफी लोग रुपकुंड की ओर जाते मिले। एक 3-4 आईएएस प्रशिक्षुओं का ग्रुप मिला जो देहरादून से आया था और रात डेढ बजे ये लोग बेदनी बुग्याल से चले थे। इनमें से ज्यादातर लोग पहाडी ही थे। इनमे से ही एक लडकी थी जो सबसे आगे चल रही थी और जरा सी भी थकी हुई नही लग रही थी। इन्होने हमसे पूछा कि रुपकुंड और कितनी दूर है। हमने कहा बस आप लोग पहुंच ही गये,अब तो थोडा ही बचा है। लगभग ग्यारह बजे हम लोग भगुवाबासा लौटे। भूख जोरों से लगी थी तो यहाँ आलू परांठे और चाय का नाश्ता लिया गया। कुछ देर आराम किया और फिर अपना टेंट वगरह का सारा ताम झाम लेकर भगुवाबासा से वापसी की राह पकड ली।

कलुवा विनायक पर वो ग्रुप मिला जो कल हमारे बाद बेदनी से चला था और रात में पत्थर नाचनी में रुका था। इनमें एक कपल से बेदनी में मेरी थोडी बहुत बातचीत हुई थी तो यहाँ मिलते ही वो बोले रुपकुंड कम्पलीट कर आये। शाबाश !  पूछने लगे भगुवाबासा और कितनी दूर है। मैंने कहा बस दो -ढाई किमी होगा और सीधा -सीधा ही रास्ता है। उन लोगों को उनकी आगे की यात्रा की शुभकामनायें देकर हम लोग नीचे चल दिए। सवा बजे के करीब पत्थर नाचनी पहुंचे। यहाँ मैगी चाय का आनंद लिया और कुछ देर आराम किया। इसके बाद आराम -आराम से चलते हुए भी करीब चार बजे तक हम लोग आली बुग्याल स्थित एक मात्र ढाबे पर पहुंच गये। इस समय आली में बादल हो रखे थे और हम थके हुए भी थे तो आज आली के 1-2 फोटो ही लिए। आली की सुंदरता का आनंद अगले दिन लिया गया जो अगली पोस्ट में दिखाया जायेगा।

भगुवाबासा कैम्प साइट से करीब एक किमी आगे जाने पर - पीछे दूर भगुवाबासा में टेंट्स दिख रहे हैं। 

रुपकुंड यात्रा का ये भाग श्रीखंड महादेव यात्रा के अंतिम दिन की याद दिला देता है।

चट्टानों का चूरा और खडे पहाड


रुपकुंड झील पर स्थित महादेव मंदिर

रुपकुंड के सुप्रसिद्ध नरकंकालों की हड्डियां 


कपाल - कपालभांति वाला नही 


एक बडे से कटोरेनुमा रुपकुंड लेक

झील के किनारे पडी इंसानी हड्डियां

अर्धजमी रुपकुंड और उसके किनारे जमी बर्फ



किसी आज के काल के आदमी का चश्मा
जुनारगली दर्रा  और उसके पास स्थित कुछ लोग दिख रहे हैं।



रुपकुंड से उपर जुनारगली दर्रे की ओर जाता रास्ता

अब झील पर यूथ होस्टल वाले ग्रुप के लोग आ गये हैं। 

रुपकुंड के दांयी ओर वाले पहाड पर बर्फ

रुपकुंड से  आधा किमी नीचे आने पर दिखता उच्च हिमालयी नजारा

थोडा ओर नीचे जाने पर दिखती त्रिशुल चोटी

वापसी के समय रास्ते से दिखता बेदनी कुंड और बेदनी बुग्याल कैम्प साइट 

बेदनी से आली बुग्याल जाता रास्ता 

शाम के समय बादलों की धुंध के बीच आली बुग्याल 

अगले दिन सुबह के साफ मौसम में आली बुग्याल 
अगले भाग में जारी......




शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

रुपकुंड ट्रैक: तीसरा दिन - बेदनी बुग्याल से भगुवाबासा

02 अक्टूबर, 2017
इस यात्रा वृतांत को शुरुआत से पढने के लिए यहाँ क्लिक करें। 
आज दो अक्टूबर है। पूरा देश गांधी जयंति मनाने में जुटा पडा है - हाँलांकि देश के दूसरे प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री जी की भी जयंती आज ही है। मैं अपने रुपकुंड मिशन पर हूँ और कल लोहाजंग से चलकर बेदनी बुग्याल तक पहुंच चुका हूँ। कल की यात्रा के दौरान मेरी कम्पनी के ही 3-4 लोग मिले थे जो बेदनी तक मेरे साथ आये हैं। आज मुझे अपने आगे की यात्रा करनी है यानी बेदनी से भगुवाबासा पहुंचना है जो कि लगभग 4200 मीटर की ऊंचाई पर है। जबकि मेरी कम्पनी वाले लोग आज आली बुग्याल देखकर वापस लौटेंगे। सुबह आराम से साढे छह: बजे के करीब सोकर उठा। फ्रेश होकर नाश्ता - पानी करके चलने की तैयारी करने में आठ, सवा आठ हो गये। लेकिन आज ऐसी कोई जल्दी भी नही थी निकलने की, क्योकि आज तो सिर्फ दस-क किलोमीटर ही चलना है। जिस ढाबे पर रात से हमारा खाना-पीना हो रहा था उसका मालिक भी एक ग्रुप को लेकर आज आगे के लिए निकलेगा और वो लोग आज पातर नाचनी में रुकेंगे। गजेंद्र उनके साथ निकलना चाह रहा था, वो तो भला उस ढाबे वाले का उसने कहा कि हम तो आराम से दस बजे के आसपास निकलेंगे। हमारे लिए इतना इंतजार करने का कोई मतलब नही था इसलिए हम ढाबे वाले को आगे मिलने की बात करके निकलने लगे तभी  नीचे से रवि लोग भी आ गये। और एक बार फिर कुछ देर के लिए ही सही हम सब भेल वाले साथ हो गये। कैम्प साइट से 150-200 मीटर दूर ही बेदनी कुंड है जहाँ तक हर वर्ष नंदादेवी की सालाना यात्रा आती है। यहाँ बेदनी कुंड के पास कुछ देर का फोटो सेशन चला। बेदनी कुंड के पानी में नंदाघुंटी और त्रिशुल दोनों चोटियों के प्रतिबिम्बों के कुछ फोटो भी लिए और यहीं से रवि लोगों को अलविदा कहा। आज वो लोग आली बुग्याल होते हुए वापस वाण जायेंगे जबकि मैं अपनी मंजिल रुपकुंड की ओर बढूंगा।

बेदनी कुंड से हम लोगों के रास्ते अलग - अलग हो गये।  बेदनी कुंड से थोडी सी चढाई चढकर हम रुपकुंड की ओर जाने वाली मेंन बटिया (पगडंडी) पर पहुंच गये। यहाँ से घोडा लौटनी तक करीब एक-डेढ किलोमीटर का हल्की - हल्की चढाई वाला रास्ता है। जब हम बेदनी से चले थे तो हमारे आगे हमसे करीब 20-25 मिनट पहले एक ग्रुप गया था। इस ग्रुप को हमनें घोडा लौटनी के आधे रास्ते में ही पकड लिया और घोडा लौटनी क्या बल्कि आगे पत्थर नाचनी और भगुवाबासा तक हम लोग साथ साथ ही गये। घोडा लौटनी पर भी एक ढाबा मिला। यहाँ 10-15 मिनट आराम किया और चाय पी। बाकी सब लोगों को यहीं छोडकर मैं आगे निकल गया। गजेंद्र को बोल दिया कि मैं आगे पत्थर नाचनी में मिलुंगा तो वो बोला कोई नी सर आप निकलो मैं आपको उससे पहले ही पकड लुंगा। घोडा लौटनी से पत्थर नाचनी तक का करीब डेढ किलोमीटर का रास्ता है। पूरा रास्ता हल्की हल्की ढलान वाला है। जहाँ बेदनी बुग्याल 3450 मीटर पर हैं वही पत्थर नाचनी करीब 3550 मीटर पर। पूरे रास्ते गजेंद्र मुझे पकड नही सका। रुपकुंड यात्रा में पत्थर नाचनी भी एक अच्छा खासा पडाव स्थल बन गया है। दीदना -आली बुग्याल के रास्ते आने वाले ज्यादातर ट्रैकर्स यहाँ रुकते हैं। लोकल लोग इस जगह हो पातर नचौणियां कहते हैं और ज्यादातर "पातर" कहके ही बुलाते हैं। बारह बजे मैं "पातर" पहुंचा। यहाँ 3-4 ढाबे हैं और 2 फाइबर हट। इनमें से एक फाइबर हट में 2-3 साल पहले आग लग गयी थी सो वह आज भी जली हालत में ही है। बताते हैं वन विभाग वालों ने कुछ लोकल पर केस भी कर रखा है इस बाबत। उनका मानना है कि उस आग लगने के लिए लोकल लोग जिम्मेदार थे। खैर जैसे भी आग लगी हो हुआ तो नुकसान ही है जो कि गलत है। यहाँ एक ढाबे पर चाय पी और खाने के लिए मैगी का ऑर्डर दे दिया। तब तक गजेंद्र और वो दूसरे ग्रुप वाले भी आ गये। गजेंद्र आते ही बोला सर बडी तेज आये हो आप। मैंने कहा भाई बस ढलान पे स्पीड थोडी बढ ही जाती है खुद बखुद।

पत्थर नाचनी में हम करीब एक - डेढ घन्टा रुके। मैगी खायी, आराम किया और कुछ फोटो खींचे। हमारे साथ जो ग्रुप चल रहा था उसमें करीब 20-25 लोग थे जिनकी लीडर एक लडकी थी। एक और गाइड और एक पोर्टर भी था उन लोगों के साथ। उसी ग्रुप में से एक बंदे की तबीयत थोडी ज्यादा खराब हो गयी। अल्टीट्यूड सिकनेस हो रही थी उसे। अल्टीट्यूड सिकनेस जिसमें उल्टी, जी मिचलाना, सर दर्द जैसी समस्या ज्यादा होती है। खाने को मन बिल्कुल नही करता है। उस बंदे का बिल्कुल ऐसा ही हाल था तो उसके साथ वाले बंदो ने उनकी टीम लीडर को बुलाया। टीम लीडर ने उस लडके की पल्स और ऑक्सीजन लेवल एक क्लिप जैसे मीटर की हैल्प से चेक किया तो पाया कि ऑक्सीजन लेवल काफी लगभग 60% या शायद उससे भी नीचे हो गया था जिसकी वजह से उस लडके को ये दिक्कत हो रही थी। तो उन्होने उसे पानी पिलाया। AMS (अल्टीट्यूड सिकनेस) की दवाई दी और आज यहीं पत्थर नाचनी में ही उसके रुकने का इंतजाम कराया जिससे उसका शरीर यहाँ के वातावरण के अनुकूल हो सके। इसी दौरान मैंने भी मौका पाकर उनसे मेरा पल्स रेट और ऑक्सीजन लेवल चेक कराया जो बिल्कुल ठीक आया, हाँ ऑक्सीजन लेवल जरुर 90 के आसपास आया जिसके लिए उस लीडर ने पानी पीते रहने की सलाह दी। खैर, ये वाक्या मैं यहाँ सिर्फ इसलिये लिख रहा हूँ ताकि आप में से जो नही जानते हैं वो लोग जान सकें कि ऊंचाई पर जाने पर क्या दिक्कत हो सकती है। और जब भी कभी ऐसी दिक्कत महसूस हो तो वहीं रुक जायें और उपर न जायें नही तो दिक्कत और ज्यादा हो सकती है।

करीब डेढ बजे हम लोग पत्थर नाचनी से चले। पत्थर नाचनी से निकलते ही कालू विनायक या कलुवा विनायक की खडी चढाई शुरु होती है जो करीब डेढ-दो किलोमीटर की है। एक खडा पहाड चढकर उसके शीर्ष पर पहुंचना होता है जहाँ कलुवा विनायक नामक गणेश जी का एक छोटा सा मंदिर है। ये एक रिज है जो आगे रुपकुंड तक गयी है मगर कलुवा विनयाक के बाद रुपकुंड का रास्ता इस रिज पर नही चढता बल्कि इसके बगल से होता हुआ भगवाबासा पहुंच जाता है। भगुवाबासा के आगे रुपकुंड के आंखिरी के एक - डेढ किलोमीटर में फिर से इस रिज पर चढना होता है जहाँ करीब 4850 मीटर की उंचाई पर रुपकुंड है जबकि रिज के शीर्ष पर करीब 5020 मीटर की उंचाई पर जुनारगली पास है जहाँ से होकर होमकुंड जाते हैं।

साढे तीन बजे थे जब हम कलुवा विनायक पहुंचे। कलुवा विनायक लगभग 4350-4400 मीटर पर है। यहाँ हवा चल रही थी और आकाश में बादल हो रखे थे। यहाँ भी एक ढाबा था लेकिन आदत के विपरीत यहाँ मैंने चाय नही पी। कुछ देर रुककर, कलुवा बाबा का आशीर्वाद लेकर और फोटो खींचकर हम आगे बढ चले क्योंकि बादल घने से होते जा रहे थे और अगले आधे एक घंटे में बारिश हो सकती थी। हाँलाकि मेरे पास रेनकोट था मगर मैं फिर भी बारिश शुरु होने से पहले ही भगुवाबासा पहुंच जाना चाहता था। जबकि गजेंद्र के पास तो रेनकोट भी नही था।

कलुवा विनायक से भगुवाबासा करीब ढाई किलोमीटर है। पूरा रास्ता हल्की हल्की उतराई वाला ही है। समुद्रतल से 4000 मीटर से उपर होने के कारण इस इलाके में ब्रह्म कमल भी खूब पाये जाते हैं। चुंकि ब्रह्म कमल बरसात के दिनों में जुलाई-अगस्त माह में खिलता है। इसलिये हमें रास्ते में जितने बही ब्रह्म कमल मिले सब सूख  चुके थे। बारिश होने की आशंका थी सो हमने जल्दी-जल्दी चलते हुए ये पूरा रास्ता पार किया और करीब चार बजे भगुवाबासा पहुंच गये।

--भगुवाबासा समुद्रतल से लगभग 4250-4300 मीटर की उंचाई पर पत्थरों और चट्टानों के बीच एक छोटी सी कैम्पिंग साइट है। यहाँ भी इंडियाहाइक वालों के टेंट्स लगे थे। भगुवाबासा में भेडपालकों की कुछ झोंपडियां हैं। मगर वो ऐसे ही वीरान पडी हैं। तीन -चार ढाबे थे और एक ढाबे पर तो रुकने की  व्यवस्था भी थी मगर सिर्फ 1-2 आदमी के लिये। ऐसे ही एक ढाबे में जाते ही चाय मिली। चाय पीकर जैसे ही हमने टेंट लगाना शुरु किया तो ओले पडने शुरु हो गये। पूरा टेंट ओलावृष्टि के बीच ही लगाना पडा और हमारे टेंट लगाने के 5-10 मिनट के बाद ही ओलावृष्टि बंद हो गयी। थोडी देर बाद मौसम थोडा सा खुल गया तो मैं बाहर टहलने निकल गया। यहाँ खच्चरों के रुकने के लिए भी कुछ टीन शेड बने थे। रुपकुंड ट्रैक पर चलने वाले खच्चर भगुवाबासा तक ही आते हैं। यहाँ से रुपकुंड तक तीन किलोमीटर लोगों को पैदल चलकर ही जाना होता है। थोडा बहुत टहलकर, कुछ फोटो खींचकर मैं वापिस अपने टेंट में लौट आया। बगल वाले ढाबे पर आलू सोयाबीन की सब्जी बनी थी हाँलाकि इस 4300 मीटर की उंचाई पर खाना खाने का कुछ खास मन नही कर रहा था फिर भी दो रोटी तो निपटा ही दी गयी। अधिक उंचाई पर होने के कारण यहाँ ठंड बहुत थी और हमारे स्लीपिंग बैग तो बेदनी बुग्याल में ही 'बोल' गये थे। इसलिए फैंसला किया कि मैं अकेला दोनों स्लीपिंग बैग के साथ टेंट में सोउंगा और गजेंद्र ने अपने सोने का जुगाड कर लिया। कल सुबह जल्दी निकलने का प्लान करके मैं अपने टेंट में सोने चला गया और दोनो स्लीपिंग बैग ओढे तब  जाकर ठंड कम सी हुई।

सुबह के समय बेदनी बुग्याल का नजारा 

बेदनी बुग्याल में ढाबे से उठता धुआं। अपना खाना पीना इसी ढाबे पर हुआ था। 

बेदनी कुंड में नंदाघुंटी का प्रतिबिम्ब 
.

नंदाघुंटी और त्रिशुल बेदनी कुंड में 

थोडा उपर से बेदनी कुंड और उसके आसपास का नजारा 
बेदनी कुंड से उपर वाले पहाड के दूसरी तरफ का नजारा 

घोडा लौटनी की ओर - इसी जगह हमने इस बडे से ग्रुप को पकडा था जो हमसे आधा घंटे पहले चले थे। 

घोडा लौटनी से पत्थर नाचनी की ओर जाती पगडंडी 



पत्थर नाचनी - ये जो दो फाइबर हट दिख रहे हैं इन्ही में आग लगी थी। 



कालु विनायक पर चौधरी कलुवा जी को राम राम कर रहा है।

कलुवा विनायाक से भगुवाबासा के रास्ते में ब्रह्म कमल 

एक और सूखा ब्रह्म कमल

भगुवाबासा के पास चरवाहों की झोंपडिया 

भगुवाबासा में औले पड रहे  हैं। 

औलावृष्टि के बाद मौसम साफ हुआ और त्रिशुल ने अपने दर्शन दिये। 

भगुवाबासा 4298 मीटर - मेरे फोन के अल्टमीटर में भी इसको 4305मीटर दिखा रहा था। 

भगुवाबासा में लगे इंडियाहाइक वालों के टेंट

बादलों के बीच चमकती त्रिशुल !!

भगुवाबासा कम्पलीट कैम्प साइट 
अगले भाग में जारी.....