शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

डोडीताल यात्रा: बेवरा चट्टी से डोडीताल


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 घर पर अपनी सलामती की सूचना देकर मैं और बलबीर नीचे बेवरा में चाचा के ढाबे पर लौट आये। दिन छिपने लगा था और चाचा ने डिनर की तैयारी शुरू कर दी थी। चूल्हे पर दाल पक रही थी, आलू राई की सब्जी पहले ही बन चुकी थी। मनीराम भी आ गया। मनीराम यानी मनी मूल रूप से नेपाली है और उपर डोडीताल में फ़ॉरेस्ट रेस्ट हाउस में चौकीदार है। साथ ही वह वहाँ स्थित गणेश मंदिर की धर्मशाला की देखरेख भी करता है। आजकल ऑफ सीजन होने की वजह से अपने बेवरा स्थित घर में रहने आया हुआ है। मनीराम ने अपनी पूरी जिंदगी डोडीताल और यहाँ आने वालों की सेवा में लगा रखी है और पिछले 24 सालों से यहीं रह रहा है। बलबीर ने बताया कि डोडीताल से आगे दारवा टॉप से एक रास्ता हनुमान चट्टी तक जाता है जिसे एक दिन में कवर किया जा सकता है। इतना सुनते ही मेरे दिमाग में विचार आया कि क्यूं न डोडीताल से वापस इसी रास्ते से आने के बजाय सीधे हनुमान चट्टी निकला जाये। गाइड को भी कोई अतिरिक्त पैसा नही देना पडेगा। और चूंकि ये पूरा रास्ता दारवा पास को पार करके जाता है तो सामने वाले नजारे भी जबरदस्त होंगे। बलबीर ने बताया कि पूरे रास्ते से हिमालय का जबरदस्त व्यू दिखता है - बंदरपूंछ, स्वर्गारोहिणी से लेकर चौखम्बा तक सारी बर्फिली चौटियां सामने ही दिखती हैं। मैंने तुरंत इस ट्रैक के लिए अपना मन बना लिया। मगर जल्द ही मनी ने मेरे इस सपने को तोड दिया। उसने बताया कि डोडीताल से हनुमान चट्टी का ट्रैक करीब 32-33 किमी का है जिसको एक दिन में किसी भी हालत में पूरा नही किया जा सकता। डोडीताल से दारवा तक पांच किमी की खडी चढाई है जिसमें कम से कम तीन घंटे लग जाते हैं जबकि आगे भी रास्ता चढाई - उतराई वाला ही है। रास्ते में कहीं कोई रूकने का ठिकाना भी नही है। और बात भी सही थी। ट्रैक चाहे कैसा भी हो एक दिन में 33 किलोमीटर पैदल चलना मेरे बसकी बात नही है। उपर से सर्दियों का मौसम, दिन भी सबसे छोटे होते हैं इस मौसम में। आइडिया ड्रॉप कर दिया गया। मन को समझा लिया कि यार फिर कभी गर्मियों में आउंगा तो इस चक्कर को पूरा करके हनुमान चट्टी तक जाउंगा और वहां से फिर यमनोत्री। दाल पकती रही और हम लोगों की बातों का सिलसिला चलता रहा।

दिन छिपते ही घुप्प अंधेरे ने सारे वातावरण को अपने आगोश में ले लिया। एक मात्र रोशनी थी तो बस चाचा के ढाबे पर - पैट्रोमैक्स और चूल्हे में जलती आग की। चूल्हे के चारों तरफ बैठकर हम लोगों ने खाना खाया और सोने के लिये अपने-2 बिस्तरों में जा घुसे। चाचा ने यहाँ 2-3 पक्के कमरे बना रखे हैं, इनमें से दो कमरों में हमारे बिस्तर लगे थे। एक में मेरा बिस्तर था जबकि दूसरे में चाचा और बलबीर का। सर्दियों का मौसम था और यहाँ ठंड बहुत थी रजाई में घुसते ही कब नींद आ गई पता ही नही चला। मगर रात में एक अजीब घटना घटी। करीब तीन बजे मेरे कमरे के दरवाजे पर किसी ने बडे जोर से दस्तक दी जिससे मेरी नींद खुल गयी। बाहर कोई जानवर आया था -हिरण हो शायद, जो सर्दी में कहीं आसरे की तलाश में था। उसने कम से कम 5-6 बार मेरे दरवाजे पर टक्कर मारी। दरवाजा भी ऐसा था कि इसमें सिर्फ एक ही चटकनी थी, वो भी उपर की तरफ। उस जानवर के बार-बार दरवाजा पीटने की वजह से कहीं वो टूट न जाये मुझे बस इसी बात का डर लग रहा था। उधर चाचा और बलबीर घोडे बेचकर सो रहे थे। खैर, थोडी देर तक टक्कर मारने पर जब वो जानवर सफल नही हो सका तो बेचारा वहां से चला गया और मेरी जान में जान आयी। इस घटना के बाद मुझे अब नींद नही आयी। मैं बस सुबह होने का इंतजार करने लगा। सुबह नाश्ते के दौरान चाचा और बलबीर को इस घटना के बारे में बताया तो पट्ठे बोले कि हमें तो पता नही चला। हम तो सो रहे थे। नाश्ते में चाय मैगी खाकर हम लोग डोडीताल के लिए निकल लिए। बेवडा से डोडीताल 14 किलोमीटर है, मतलब हमें पहुंचने में शाम ही हो जायेगी और रास्ते में कहीं कुछ खाने को भी नही मिलेगा। इसीलिए साथ में रास्ते के लिए तीन आलू के परांठे भी पैक करा लिए।

करीब पौने आठ बजे हम बेवरा से चले। शुरू में चार किलोमीटर यानी धारकोट तक चढाई भरा रास्ता है। पूरे पहाडों पर गजब का सूखा पडा था। सारी घास सूख चुकी थी। यहाँ तक की पेड तक सूख रहे थे। और ऐसा हो भी क्यों ना? दिसंबर का आंखिरी सप्ताह आने वाला था और अब तक यहाँ बारिश या बर्फबारी नही हुई थी। जबकि आमतौर पर यहाँ दिसम्बर के पहले सप्ताह में ही बर्फ पड जाया करती है। पूरे रास्ते पर धूल उड रही थी। थोडी दूर सामने तो किसी पहाडी पर धुंआ भी उठता दिखायी दिया। शायद वहां जंगल में आग लग गयी थी। इस सबको ग्लोबल वार्मिंग का नतीजा कहें या कुदरत की निश्ठुरता, उत्तराखंड के जो पहाड इन दिनों बर्फ से लकदक रहते थे वहां गजब का सूखा पड रहा था - जंगल धधक रहे थे। दो दिन बाद यात्रा पूरी करके जब मैं घर पहुंचा तो मैंने 24 दिसम्बर के अखबार में पढा कि गंगोत्री से थोडा पहले स्थित हर्शिल के जंगलों में इन दिनों आग लगी हुई थी जिसे प्रशासन 2-3 दिन तक नही बुझा पाया था। वो तो भला हो उपर वाले का कि 25 दिसम्बर को उत्तर भारत का मौसम बिगडा और सारे पहाडी राज्यों समेत उत्तराखंड में भी बारिश और बर्फबारी हुई जिससे वो आग स्वत: ही बुझ गयी।

करीब दस बजे हम धारकोट पहुंचे। यहाँ यात्रियों के कुछ देर आराम करने के लिए एक शेड बना है। जिसकी वजह से इस जगह को लोग छतरी कहते हैं। यहाँ हम लोगो ने 10-15 मिनट आराम किया। यहाँ अस्सीगंगा काफी गहरी घाटी में बहती है जबकि अस्सी गंगा के उस पार सुप्रसिद्ध दयारा बुग्याल है। छतरी से डोडीताल 10 किमी है जबकि मांझी 5 किलोमीटर। मांझी एक कैम्पिंग स्थल है और यहाँ काफी झोंपडियां बनी हुई हैं। डोडीताल जाने वाले ज्यादातर ट्रैकर्स अपने टेंट वगरह लेकर आते हैं और मांझी में भी एक रात विश्राम करते हैं। मांझी से करीब 2 किलोमीटर पहले एक रास्ता सतगडी होते हुए दयारा बुग्याल भी जाता है। दयारा बुग्याल यहाँ से 15 किलोमीटर दूर है। हाँलाकि दयारा का मुख्य रास्ता उत्तरकाशी-गंगोत्री रोड पर स्थित भटवाडी के पास बरसू से है। मगर डोडीताल की तरफ से भी दयारा बुग्याल जाया जा सकता है।

साढे बारह बजे हम माझी पहुंचे। यहाँ से दूर एक पहाडी के पीछे बंदरपुंछ चोटी के हल्के से दर्शन हुए। लंच का समय हो रहा था और भूख भी लगने लगी थी। चाचा के ढाबे से लाये गये परांठे निपटाये गये। अचार के साथ आलू के परांठे खाकर आनंद आ गया। मांझी में हमने कुछ देर आराम किया और फिर अपनी आज की मंजिल की ओर बढ चले। मांझी से डोडीताल पांच किलोमीटर रह जाता है। रास्ता भी हल्की चढाई वाला ही है। अपने पास समय बहुत था तो हम आराम से फोटो खींचते हुए चलने लगे। मांझी से आगे दो झरनें मिले जो कि आंशिक रूप से जमें हुए थे। इसका मतलब था कि भले ही अभी यहाँ बारिश या बर्फबारी न हुई हो मगर ठंड अच्छी खासी पड रही थी, इसीलिए झरनों में बहता पानी जम गया था। मांझी से करीब साढे तीन - चार किलोमीटर चलने के बाद एक जगह आती है भैरों मंदिर, यह पूरे डोडीताल ट्रैक का उच्चतम स्थान है। यहाँ भैरों बाबा का एक छोटा सा मंदिर बना है। भैरव मंदिर के बाद पूरा रास्ता हल्की उतराई वाला है। करीब एक किलोमीटर की उतराई के बाद रास्ता समतल हो जाता है। थोडा सा और चलने पर जंगल अचानक से खत्म हो जाता है, और हम पहुंच जाते हैं डोडीताल - साफ पानी की एक उच्च हिमालयी झील और भगवान गणेश का स्थान।

करीब तीन बजे हम लोग डोडीताल पहुंचे। यहाँ एक फॉरेस्ट रेस्ट हाउस है जिसमें ठहरनें के लिए बुकिंग डी0 एफ़0 ओ0 ऑफिस उत्तरकाशी से होती है। यहाँ भगवान गणेश का एक मंदिर भी है, पास ही इस मंदिर की धर्मशाला है। साथ ही एक - दो ढाबे बने हुए हैं जो अगोडा वालों के हैं। इन्ही ढाबे में से एक में आज हम लोग रुकेंगे। अभी तीन ही बजे थे, दिन काफी था। थोडी देर आराम करके और चाय पीकर हम लोग ताल पर घूमने निकल लिए। सबसे पहले गणेश जी को नमन किया। मंदिर हाँलाकि बंद था। यहाँ भी उत्तराखंड के ज्यादातर मंदिरों की तरह ही कपाट सिस्टम है। डोडीताल स्थित गणेश मंदिर के कपाट भी उसी दिन बंद होते हैं जिस दिन यमनोत्री जी के कपाट बंद होते हैं।

डोडीताल के चारों ओर एक पगडंडी बनी हुई है, जिससे झील की परिक्रमा की जा सकती है। हम लोग भी परिक्रमा के लिए निकल गये। इस दौरान हमें "गोल्डन स्प्राउट फिश" भी दिखाई दी जो कुछ ही उच्च हिमालयी झीलों में पायी जाती हैं। ताल की परिक्रमा करके और ढेर सारे फोटो खींचकर हम लोग ढाबे पर लौट आये। दिन छिपने लगा था और ठंड बढनी शुरू हो गयी थी। जल्दी ही हम लोग डिनर करके अपनी - अपनी रजाईयों में जा घुसे।

ये है धारकोट। इस यात्रीशेड की वजह से यहाँ के लोग इस स्थान को छतरी भी कहते हैं।

पहाड में सूखा!!!


अस्सीगंगा के दूसरी ओर वाली पहाडी का नजारा। सामने थोडा दांयी ओर जो थोडा समतल सा भाग दिख रहा है वो दयारा बुग्याल का सबसे उपरी भाग है।


इस  जगह को छोटी मांझी कहते हैं।
दयारा बुग्याल जाने वाले रास्ते के बारे में जानकारी देता वन विभाग का एक सूचना बोर्ड

दिसम्बर में वीरान पडी मांझी

मांझी  से बहुत दूर दिखती बर्फ से ढकी बंदरपूंछ चोटी की एक झलक

"मोहब्बते" फिल्म वाले पत्ते!!!

झरने का बहता पानी जम गया है - मतलब ठंड बहुत है।


भैरव मंदिर पर  लगा बोर्ड। मेरे हिसाब से यह बोर्ड भैरव मंदिर की समुद्र तल से ऊंचाई के बारे में गलत जानकारी दे रहा है। क्योंकि ये जगह पूरे डोडीताल ट्रैक की सबसे ऊंची जगह है। इसकी ऊंचाई 2900 मीटर दर्शायी गयी है जबकि डोडीताल 3050 मीटर पर है। मेरे अनुमान से ये जगह 3150 - 3200 मीटर के आस पास होनी चाहिये। किसी ने इस बोर्ड पर ही खुरचकर 3223 मीटर लिखा है जो कि शायद सही है।


जंगल खत्म, बस पहुंच गये डोडीताल।


डोडीताल झील और उससे निकलती अस्सीगंगा

सामने थोडा बांयी ओर दारवा टॉप है। डोडीताल से दारवा तक खडी चढाई साफ देखी जा सकती है।

डोडीताल स्थित गणेश मंदिर

उपर पहाड से झील तक आने वाली एक छोटी सी जलधारा
डोडीताल झील में पायी जाने वाली "गोल्डन स्प्राउट फिश" की एक झलक - काश ! मेरे पास और अच्छा कैमरा होता

डोडीताल से निकल आगे बढती अस्सीगंगा

फॉरेस्ट रेस्ट हाउस - डोडीताल


अ‍गले भाग में जारी.........

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

डोडीताल यात्रा: हरिद्वार से बेवरा चट्टी

काफी समय से सोच रहा था कि डोडीताल लेक जाया जाये। पहले ओक्टूबर में, उसके बाद नवम्बर में भी जाना नही हो पाया। फिर BCMTOURING साइट पर श्री मुकेश वर्मा जी का यात्रा वृतांत देखा। वर्मा जी पिछले साल 22 से 26 दिसम्बर तक डोडीताल ट्रैक पर गये थे। तब वहां 2-3 फीट तक ताजी बर्फ थी। उनके फोटो देखते ही तय कर लिया कि बस मुझे भी इस साल, इसी दौरान मतलब दिसम्बर के तीसरे सप्ताह में डोडीताल जाना है। 24 दिसम्बर की क्रिसमस ईव की छुट्टी थी और 25 को संडे था। बस फिर क्या था? 22-23 की छुट्टी ली ऑफिस से और फाइनल प्लानिंग शुरू हुई डोडीताल की। अनंत से डोडीताल चलने के बारे में बात की लेकिन वो अभी दो दिन पहले ही घर से एक हफ्ते की छुट्टी बिताकर लौटा था तो उसका जाना सम्भव नही हो पा रहा था। वैसे भी हम दोनो एक ही सेक्शन में हैं तो हम दोनो को एक साथ छुट्टी मिलना भी मुश्किल ही था। बस अबकि बार अकेले चलने का फैसला किया। चुंकि सर्दियों का मौसम था तो बैग भरके गर्म कपडे ले लिये और निकल लिया डोडीताल की यात्रा पर।

ग्यारह बजे ऋषिकेश पहुंचा। यहाँ रोडवेज बस अड्डे के पास ही एक प्राइवेट बस अड्डा भी है जहाँ से जीएमवीएन की बसें चलती हैं। उत्तराखंड परिवहन की उपर पहाड पर जाने वाली सभी बसें सुबह-सुबह ही निकल जाती हैं। प्राइवेट बस अड्डे पर उत्तरकाशी जाने वाली एक बस खडी थी। टिकट लिया और चढ लिया इसमे। बस सवा ग्यारह बजे ऋषिकेश से चल दी। ऋषिकेश से उत्तरकाशी 165 किमी है। उत्तराखंड की बसों में एक और रिवाज है। पहाड पर जाने वाली सभी डाक यहाँ इन बसों में डाल दी जाती हैं और कंडक्टर साब की जिम्मेदारी होती है उनको रास्ते में पडने वाले गांवों, कस्बों और शहरों में स्थित पोस्ट-ऑफिसों तक पहुंचाना जहाँ डाक विभाग का कोई कर्मचारी इन डाकों को कंडक्टर साब से ले लेता है। मतलब बेचारे कंडक्टर साब को डबल काम करना होता है - सवारियों की टिकट बनाने के साथ-साथ डाक पहुंचाने का! ऐसा शायद सिर्फ हमारे पहाड में ही मुमकिन है नही तो मैदानों में तो कंडक्टर साब एक ही काम ठीक से कर ले वो ही काफी है। खैर, ऋषिकेश से निकलते ही पहाड शुरू हो गये और लोगों को उल्टियां शुरू। मैं इससे बचने के लिए आगे वाली सीट पर ही बैठा था। उपर वाले की दुआ से मुझे पूरे रास्ते में कहीं भी उल्टी-चक्कर की दिक्कत नही हुई।

करीब डेढ बजे चम्बा पहुंचे। मैन चौराहे के पास ही चालक ने बस रोक दी - जिसको खाना खाना है, खा लो। बस यहाँ आधे-पौने घंटे के लिए रुकेगी। भूख भी जोरों की लग रही थी, एक प्लेट राजमा चावल निपटा दिये। लगभग ढाई बजे चम्बा से चले। मैन चौराहे से पुरानी टिहरी रोड पर थोडा चलते ही बांयी ओर गंगोत्री रोड के लिए मुड गये। दरअसल गंगोत्री रोड पहले इसी पुरानी टिहरी रोड से होकर ही जाती थी, लेकिन टिहरी बांध बनने से यह रोड पानी में समा गयी और उत्तरकाशी-गंगोत्री जाने के लिए ये नई रोड बनी जो थोडा घूमकर जाती है। जबकि अब पुरानी टिहरी रोड भागीरथी पुरम, डैम तक जाती है।

छाम, कंडीसौड, चिन्यालीसौड होते हुए करीब पांच बजे बस धरासू बैंड पहुंची। धरासू बैंड एक तिराहा है जहाँ से गंगोत्री और यमनोत्री का रास्ता अलग होता है। यहाँ से सीधा रास्ता उत्तरकाशी होते हुए गंगोत्री जाता है जबकि दूसरा बांयी ओर वाला रास्ता बडकोट होते हुए यमनोत्री जाता है। यहाँ भी बस 5-10 मिनट के लिए रुकी। सर्दी सी लग रही थी। एक चाय निपटा दी गयी। धरासू बैंड से उत्तरकाशी लगभग 25-26 किलोमीटर रह जाता है। करीब छह बजे उत्तरकाशी पहुंचा। अपने गाइड बलबीर पंवार को फोन किया, वो आज उत्तरकाशी में ही था। अपने गांव के प्रधान के साथ किसी मीटिंग में शामिल होने आया था। बलबीर बस अड्डे पर ही आ गया। होटल पहुंचने पर जब भयंकर ठंड लगने लगी तो समझ आया कि मैं पहाड में आ चुका हूँ। एक्स्ट्रा जैकेट पहनी और गरम लोई औढी तब जाकर ठंड कम सी हुई। रात हो चुकी थी और अब करना भी क्या था? बस डिनर किया और सो गये।

दूसरा दिन:
अगले दिन सुबह 7 बजे आंख खुली तो याद आया कि मैं तो उत्तरकाशी में हूँ। सुबह के समय भी काफी ठंड थी। और ज्यादा ठंड में मेरे नहाने का तो सवाल ही नहीं उठता। बस हाथ - मुंह धुले, नाश्ता किया और निकल लिए। उत्तरकाशी बस अड्डे से थोडा सा आगे चलते ही जीप-स्टेंड है जहाँ से मनेरी, भटवाडी, संगमचट्टी वगरह के लिए जीपें चलती हैं। हमें संगमचट्टी जाना था जहाँ से डोडीताल का ट्रैक शुरू होता है। सुबह का समय था तो संगमचट्टी जाने वाले काफी कम लोग थे - मैं, बलबीर, अ‍ग़ोडा गांव के स्कूल में पढाने वाले एक मास्टर जी। बस हम तीन ही लोग थे। जीप वाले ने बोला कि कम से कम 8-10 सवारियां होंगी तब मैं चलुंगा। करीब एक - डेढ घंटा लग गया इतनी सवारियां होने में। करीब दस बजे हम यहाँ से चले। उत्तरकाशी से संगमचट्टी 15 किलोमीटर है और पूरा रास्ता गंगोरी से अस्सीगंगा नदी के साथ-साथ जाता है। गंगोरी, उत्तरकाशी से करीब तीन किलोमीटर दूर गंगोत्री रोड पर है। अस्सीगंगा का जन्म डोडीताल लेक से ही होता है और गंगोरी में ये भागीरथी में मिल जाती है। अस्सीगंगा नदी में 2012 में बाढ आयी थी जिसके निशान नदी में आज तक दिखायी देते हैं। बडे-बडे पत्थर नदी में हर जगह बिखरे पडे थे। करीब पौने ग्यारह बजे संगमचट्टी पहुंचे। सडक बस यहीं तक आती है। इस इलाके में तीन - चार गांव हैं जिनके लिए संगमचट्टी जीप - स्टेंड का काम करता है। यहाँ दो-तीन ढाबे भी हैं। यहीं एक ढाबे पर चाय पी और अपनी डोडीताल यात्रा का पैदल सफर शुरू कर दिया।

संगमचट्टी से निकलते ही चढाई शुरू हो गयी। कच्ची मिट्टी के पहाड पर जगह - 2 भूस्खलन हो रखा था। रास्ता भी उसी के उपर से बना हुआ था। संगमचट्टी से अगोडा गांव पांच किलोमीटर है और पूरा रास्ता अस्सीगंगा के बांयी और से जाता है। मेरा गाइड बलबीर अगोडा का ही रहने वाला है। बलबीर ने निम (नेहरू पर्वतारोहण संस्थान) उत्तरकाशी से बेसिक माउंटेनियरिंग का कोर्स कर रखा है और डोडीताल- दारवापास-हनुमानचट्टी, दयारा बुग्याल के ट्रैक पर गाइड का काम करता है।

लगभग दो घंटे लगे हमें अ‍गोडा पहुंचने में। अगोडा से थोडा पहले बांयी ओर एक और गांव पडता है - भंकोली नाम है शायद। अगोडा में एक प्राइमरी स्कूल है जबकि भंकोली में इंटर कॉलिज है। इन स्कूलों में पढाने वाले ज्यादातर टीचर्स या तो गंगोरी में रहते हैं या उत्तरकाशी में। यानी हर रोज इन टीचर्स को अपने-अपने स्कूल पहुंचने के लिए काफी मशक्कत करनी पडती है। पहले 15 किलोमीटर उबड-खाबड पहाडी रास्तों पर जीप से संगमचट्टी पहुचो और फिर 5 किलोमीटर पैदल चलो तब जाकर कहीं स्कूल पहुंच पाते हैं। हिम्मत है भाई इन मास्साब की! खैर, अगोडा में हम सीधे बलबीर के घर पहुंचे। बलबीर ने पहले ही अपनी घरवाली को राजमा-भात बनाने कि लिए बोल दिया था। यहाँ पहुंचकर राजमा-भात का आनंद लिया। कुछ देर आराम किया और अपनी आज की मंजिल बेवरा चट्टी की और बढ चले।

अ‍गोडा से बेवरा दो किलोमीटर के करीब है। पूरा रास्ता उतराई वाला है। एक घंटे में ही हम लोग बेवरा चट्टी पहुंच गये। डोडीताल ट्रैक पर अगोडा के अलावा और कोई गांव नही पडता। बस दो तीन जगह कैम्पिंग साइट हैं जहाँ या तो ढाबे बने हुए हैं या फिर हट्स। बेवरा ऐसी ही एक कैम्पिंग साइट है। मैंने तो पूरी यात्रा में इसे बेवडा ही बोला! यहाँ तीन-चार ढाबे और रुकने के ठिकाने बने हुए थे, शायद गर्मियों में जब डोडीताल यात्रा का सीजन होता है तब यहाँ बहार रहती होगी। मगर अब केवल एक ही ढाबा खुला था - चाचा का ढाबा! अभी पौने तीन ही बजे थे और बेवरा में नेटवर्क नही था। घर भी फोन करके अपनी सलामती की सूचना देनी थी तो कुछ मटरगस्ती करने और घर बात करने के लिए हम उपर की ओर निकल लिये।
हरिद्वार में मेरे क़्वाटर के आंगन में खिला एक गुलाब

ऋषिकेश


उत्तरकाशी का शोक - वार्णावत पर्वत

अगली सुबह उत्तरकाशी बस अड्डे के पास

पहचान तो गये ही होगे आप

उत्तराखंड में भी जल्द ही चुनाव आने वाले हैं।
संगमचट्टी - ये जो बंदा अपनी पैंट उपर कर रहा है यही हमारा ड्राईवर था जिसने उत्तरकाशी से आते समय कम से कम 8-10 सवारियां होने पर ही चलने की बात कही थी।

डोडीताल पैदल यात्रा शुरू-अस्सीगंगा के उपर बना पुल

थोडा उपर जाने पर दिखता संगमचट्टी

भू-स्खलन और उसके उपर से जाता रास्ता। पास में ही दांयी साइड में गहरी घाटी में अस्सीगंगा बह रही है।

दूर से दिखता अगोडा गांव - अगोडा में भी फॉरेस्ट विभाग वालों एक रेस्ट हाउस है।

ये बोर्ड देखकर पता चला कि अगोडा से भी कोई रास्ता हनुमान चट्टी के लिए जाता है। हनुमान चट्टी यमुना घाटी में है।

बेवडा में एक छोटी सी नदी के पुल पर

बेवडा से दूरियां

बेवडा!!

बहुत खलबली मचा रहा था, आंटी जी ने पकड लिया।


घर पर सूचना दी जा रही है कि सही सलामत हूँ।
ढाबे पर कुछ विचार-विमर्श में - चाचा, बलबीर और डोडीताल स्थित फॉरेस्ट रेस्ट हाउस का चौकीदार मनी। चूल्हे पर दाल पक रही है। चाचा ने डिनर में आलू राई की सब्जी और दाल बनायी थी।
अगले भाग में जारी......

बुधवार, 23 नवंबर 2016

हरिद्वार भ्रमण -1: बिल्केश्वर महादेव, चीला, राजाजी नेशनल पार्क और विंध्यवासिनी मंदिर

20 नवम्बर 2016, दिन - रविवार
अभी - 2 हरिद्वार भ्रमण करके लौटा हूँ। थोड़ा अच्छा सा फील हो रहा है। बहुत दिन हो गये थे घर से निकले हुए। पहले प्लान किया था कि दशहरे के टाइम पर डोडीताल जाऊँगा, वो फेल हुआ। फिर प्लान किया कि दिवाली के बाद घर से आकर 13-14 नवम्बर के आस-पास मध्यमहेश्वर जाऊँगा। मगर पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते वहां भी नहीं जा पाया। उपर से मेरे पास छुट्टियाँ भी नही बची हैं, नही तो आज भी मध्यमहेश्वर निकला जा सकता था। मदे बाबा के कपाट अभी 22 को बंद होंगे। इस साल तो अब बस मध्यमहेश्वर रह गया, लेकिन फिर कभी जरूर जाऊँगा। खैर, अब बात करते हैं आज की ! तो जी हुआ यूँ कि मै अपने रूम पर पडा था और बोर हो रहा था। सुबह तक कही जाने का भी कोई प्लान नही था। बस अचानक अनंत की याद आयी और उसे फोन मिला दिया।
" अनंत यार कहीं घूमने चलते हैं"
"कहाँ चलना है सर?"
मेरे दिमाग में एकदम से आया, "बिल्केश्वर महादेव होते हुए विंध्यवासिनी मंदिर चलते हैं।"
"ठीक है सर मैं साढे बारह बजे तक आपके रूम पर आता हूँ।" अनंत ने कहा
 
विंध्यवासिनी मंदिर हम लोग पिछले साल भी इन्ही दिनों में गये थे। ये मन्दिर हरिद्वार से करीब 15-20 किलोमीटर दूर राजाजी राष्ट्रीय पार्क के चीला रेंज के जंगलों में एक छोटी सी पहाडी पर स्थित है। छोटा सा मंदिर है, मगर ये जगह बहुत ही सुंदर और एकदम शांत है। विंध्यवासिनी मंदिर, पौडी - गढवाल जिले के यमकेश्वर ब्लॉक के अंतर्गत आता है। अर्थात एक तरह से आज हम लोग पौडी - गढवाल जिले में भी घूम आये।
 
अनंत पौने एक बजे मेरे पास आया और हम लोग अपने आज के हरिद्वार भ्रमण पर निकल लिए। रानीपुर मोड से पहले ही जो रास्ता हरिद्वार बाईपास की तरफ जाता है, हम उसी पर हो लिए। हरिद्वार बाईपास रानीपुर मोड के पास से पहाडी के सहारे रेल्वे लाइन के बांयी ओर से होकर मंसा देवी के पैदल रास्ते के पास से होता हुआ भूपतवाला तक जाता है। इसे खड्खडी बाईपास के नाम से भी जाना जाता है। इसी बाईपास पर 4-5 किलोमीटर चलने के बाद बांयी ओर ही पहाडी के नीचे बिल्केश्वर महादेव मंदिर है। जैसे कि भारत के हर मंदिर से कोई ना कोई मान्यता जुडी होती है, वैसे ही इस मंदिर से भी जुडी है। कहते हैं कि यहाँ माता पार्वती ने भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए तप किया था। वैसे मुझे तो ऐसा कुछ नही लगा यहाँ!
 
रानीपुर मोड से मन्सा देवी मंदिर की ओर जाता हरिद्वार बाईपास
 

भक्त अ‍नंत !!
भोलेबाबा के दर्शन करके हम लोग सीधे भीमगोडा बैराज पहुँचे। यहीं से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खुशहाली अर्थात गंग-नहर निकलती है। हरिद्वार की जगत-प्रसिद्ध हर की पौडी भी इसी गंग नहर पर बनी है। भीमगोडा बैराज से निकलकर गंगनहर मुजफ्फरनगर, मेरठ, गाजियाबाद, बुलंद्शहर होते हुए अलीगढ़ में स्थित नानु तक जाती है जहां से यह कानपुर और इटावा में शाखाओं में बंट जाती है। भीमगोडा बैराज से आगे जाने वाली गंगा की धारा को हरिद्वार में नीलधारा के नाम से जाना जाता है। इस बैराज का नियंत्रण अभी भी उत्तर प्रदेश सिचाई विभाग के पास है। कुछ देर यहाँ रुककर हम लोग चीला के लिए निकल गये।
भीमगोडा बैराज से निकलती पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खुशहाली - गंग नहर

बैराज के पास - पीछे नीलधारा अर्थात गंगाजी और उत्तर प्रदेश सिचाई विभाग का गेस्ट हाउस
भीमगोडा बैराज की टेक्निकल जानकारी
बैराज से निकलते ही जंगल शुरु हो गया और हम राजाजी नेशनल पार्क के चीला रेंज में घुस गये। राजाजी को सन्‌ 1983 में नेशनल पार्क घोषित किया गया था, एवम्‌ इसका कुल इलाका 120 वर्ग किलोमीटर के आस-पास है। यह जानकारी मुझे एक जगह सूचना बोर्ड पर लिखी मिली। आजकल पार्क पर्यटकों के लिये खुला हुआ है तो यहाँ काफी चहल-पहल थी। चीला में ही गढ़वाल मंडल विकास निगम वालो का एक पर्यटक आवासगृह भी बना हुआ है। यहाँ हमें ना ही रुकना था और न ही हम रुके। चीला में उत्तराखंड जल विद्युत निगम का 144 मेगावाट का एक पावर हाउस है। ये पावर हाउस ऋषिकेश के वीरभद्र बैराज से आने वाली एक नहर पर बना है। हम रुके कुछ देर के लिए इसी चीला जल विद्युत गृह के पास। कुछ फोटो खींचे और आगे बढ गये। यही रोड आगे ऋषीकेश तक जाता है, अच्छा बना हुआ रोड है और इस पर ट्रेफिक भी नही होता। पावर हाउस से आगे रास्ता नहर के साथ-2 ही है।
 
करीब 5-6 किलोमीटर चलने पर नहर पार करके गंगा-भोगपुर गांव आता है। यहीं से एक कच्चा और पथरीला रास्ता जंगल के अंदर से होता हुआ विंध्यवासिनी मंदिर तक जाता है। पूरे रास्ते पर जंगली जानवरों के मिलने का खतरा बना रहता है। यहाँ रेत और छोटी बजरी का अवैध खनन भी बहुत होता है। आगे जाने पर एक दो छोटी -2 बरसाती नदियां मिली। इनमे पानी कम था, मगर इसकी स्पीड काफी थी। एक दो जगह मुझे बाइक से उतरना भी पडा। किसी तरह से रेत, बजरी के रास्तों और बरसाती नदियों से निकलते हुए हम लोग 2 बजे तक विंध्यवासिनी मंदिर पहुँचे। दर्शन किए, प्रसाद खाया और नीचे मंदिर के पास ही बनी एक दुकान पर चाय की चुश्कियां लेने पहुँच गये। मैंने अंदाज लगाया कि यहाँ से झिलमल गुफा और नीलकण्ठ महादेव ज्यादा दूर नही होने चाहिये और वापस घर आकर गूगल मैप पर चेक किया तो झिलमिल गुफा तो पास में ही निकली। मंदिर के नीचे बनी दुकान पर चाय पीकर और कुछ देर रुककर हम लोग वापस लौट आये। अबकि बार जब भी विंध्यवासिनी मंदिर जाऊँगा तो झिलमिल गुफा जरूर देखूँगा। कहते हैं वहां कोई पहुँचे हुए बाबा रहते हैं।
 
चीला पावर हाउस

सामने के किनारे पर चीला जल विद्युत गृह लिखा हुआ है।

पौडी गढवाल जिला
गंगाभोगपुर खनन क्षेत्र
 
एक जलधारा को पार करता हुआ अनंत - यहाँ कोई रास्ता भी नही बना है।


 

विंध्यवासिनी मंदिर के पास जूते निकालकर पानी में चलने का आनंद उठाता अनंत

मंदिर की ओर जाती सीढियां

विंध्यवासिनी मंदिर के पास

उदासीन अखाडा - कुश्ती वाला अखाडा नही बाबा लोगों वाला
 

वो उधर, उस पहाडी के पीछे नीलकण्ठ महादेव होना चाहिये, यही कहा था मैंने अनंत को। और वाकई नीलकण्ठ उधर ही है


विंध्यवासिनी मंदिर से वापस आते समय हम लोग कुछ देर चीला में रुके थे। यहाँ राजाजी नेशनल पार्क का एक गेट बना हुआ है। और यहीं जंगल सफारी करायी जाती है। नीचे पेश हैं यही गेट और इसके आस-पास के कुछ फोटोज:-
राजाजी नेशनल पार्क में जंगल सफारी करा पर्यटकों को लेकर लौटती एक जीप

25 अप्रैल 2015 को राजाजी नेशनल पार्क को टाइगर रिजर्व घोषित कर दिया गया है। 




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