बुधवार, 19 अप्रैल 2017

डोडीताल से वापसी

24 दिसम्बर, शनिवार 
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आज मेरी डोडीताल यात्रा का तीसरा दिन है। कल मैं अपने गाइड बलबीर के साथ बेवरा से डोडीताल आ गया था और झील की परिक्रमा व आस-पास के इलाके का अन्वेषण कर लिया था। अभी चुंकि डोडीताल यात्रा का सीजन नही है तो मेरे गाइड बलबीर ने ही बात करके हम दोनो के डोडीताल पर रुकने खाने का इंतजाम एक ढाबे पर करवाया था। आज सुबह-तडके मैं सात बजे सोकर उठा। ठंड बहुत ज्यादा थी, आधे घंटे तक तो रजाई में ही पडा रहा। बलबीर मुझे बिस्तर पर ही चाय दे गया - इस कडाके की ठंड में रजाई औढकर चाय पीने का भी अपना मजा है। करीब आठ बजे में रजाई छोडकर ढाबे से बाहर निकला। बहुत ही जबरदस्त नजारा था। किसी झील का पानी इतना साफ हो सकता है, मैंने अब तक सिर्फ फोटो में ही देखा था। एकदम "क्रिस्टल क्लियर" पानी था - और शायद इसके लिये ही डोडीताल प्रसिद्ध है।


नित्य कर्म से फारिग होकर मैं डोडीताल का एक चक्कर लगाकर आया। अब तक ढाबे वाले ने चाय, आलू के परांठों का नाश्ता तैयार कर दिया था। ढाबे वाले भाई का नाम भूल गया हूं। अरे! हाँ ! याद आया मनवीर नाम है इसका तो। बडा अच्छा व्यहवार था मनवीर भाई का। हमने 2-2 परांठे अभी खाये और 1-1 परांठा रास्ते के लिए पैक करा लिया। करीब पौने नौ बजे मैं और बलबीर डोडीताल से वापस चल दिये। मनवीर भी आज ही वापस चलेगा लेकिन उसे अभी कुछ काम करना है। वो दोपहर को निकलेगा और शाम तक आराम से अपने घर अगोडा पहुंच जायेगा। डोडीताल से हल्की - हल्की चढाई चढकर आधे घंटे में हम लोग भैरो मंदिर पहुंच गये। यहाँ के बाद से बेवरा तक का पूरा रास्ता उतराई वाला है।  तेज-तेज चलते हुए और शॉर्टकट मारते हुए करीब सवा बारह बजे हम लोग बेवरा पहुंचे। यहाँ उन्ही चाचा के ढाबे पर चाय बनवायी और साथ में लाये हुए परांठे खाये।

सुबह डोडीताल से हम यह सोचकर चले थे कि आज अगोडा में रुकना है। बलबीर के घर पर रूकने का प्लान था, सोचा थोडी और मदद इस बेचारे के परिवार की भी हो जायेगी। मगर जब साढे तीन घंटे में ही बेवरा पहुंच गये तो दिमाग ने मन के उपर हावी होना शुरू कर दिया। यार ! साढे तीन घंटे में हम लोग करीब चौदह किलोमीटर आ गये। अगर आज रात अगोडा रुके तो कल फिर सुबह-सुबह वहां से भागना पडेगा और हरिद्वार पहुंचते-2 रात हो जायेगी। इससे अच्छा तो आज ही उत्तरकाशी निकल जाता हूँ। आराम से होटल में रहूँगा और कल फिर आराम से वक्त रहते हरिद्वार पहुंच जाउंगा। मन से एक बार फिर आवाज आई, अरे भाई! पैसे तो वहां भी लगेंगे रहने खाने के और शायद अगोडा से ज्यादा ही लगेंगे। मगर वहां आराम ज्यादा रहेगा और अभी तो वक्त भी है आज ही या कल सुबह काशी - विश्वनाथ मंदिर भी देख लूंगा - दिमाग ने दलील पेश की। खैर, दिमाग की बात मानी गयी और फैंसला किया कि आज ही उत्तरकाशी निकलना है। बलबीर को भी अपने विचार और तमाम दलीलों से अवगत कराया जिसको उसने आराम से स्वीकार कर लिया।

चाचा से अलविदा ले एक बजे के करीब हम बेवरा से निकल लिए। बलबीर ने बताया कि सर अगर चार बजे से पहले संगमचट्टी पहुंच गये तो आराम से जीप मिल जायेगी उत्तरकाशी के लिये, इसलिए थोडा तेज चलिये। हालांकि बेवरा से अगोडा के दो किलोमीटर का रास्ता चढाई वाला है मगर फिर भी करीब 35 मिनट में ही हम अगोडा पहुंच गये। मुश्किल से पांच-सात मिनट रुके, पानी पिया और निकल लिए संगमचट्टी के लिये।

संगमचट्टी से करीब एक किलोमीटर पहले ही बलबीर चलने में असमर्थ सा होने लगा। बोला सर मैं थक गया हूँ और अभी मुझे 4-5 किलोमीटर वापस अगोडा भी जाना है। प्लीज! आप अब अकेले निकल जाईये। मैने कहा ठीक है यार एक किलोमीटर की ही तो बात है, तू निकल जा वापस, मैं चला जाउंगा। बलबीर का हिसाब कर उसे विदा किया और नीचे संगमचट्टी की ओर कदम बढा दिये। करीब पौने तीन बजे मैं संगमचट्टी पहुंच गया। मन में खुशी के भाव थे कि मैंने भी डोडीताल ट्रैक पूरा कर लिया है। मलाल था तो सिर्फ एक बात का कि बर्फ नही मिली जिसके लिए इस दिसम्बर के अंतिम सप्ताह मे मैं यहाँ आया था। दिन छिपने से पहले ही मैं उत्तरकाशी पहुंच गया। होटल में कमरा लेकर, गर्म पानी से हाथ पैर धुले। हल्का आराम किया और फिर काशी - विश्वनाथ मंदिर देखने के लिये चला गया।

कल रात को मैं इसी बिस्तर पर सोया था।


सुबह-2 डोडीताल किनारे चौधरी साब

सुबह के समय डोडीताल के आसपास का दृश्य

है ना एकदम "क्रिस्टल क्लियर" पानी

डोडीताल से वापसी शुरू - एक किलोमीटर की हल्की सी चढाई और सामने इस पूरे ट्रैक का उच्चतम भाग अर्थात भैरो मंदिर
सामने गिदारा टॉप और उसके आस-पास की चोटियों के पीछे बादल आने शुरू हो गये हैं। अपनी तीन दिन की यात्रा में मैंने आज पहली बार बादलों की हल्की सी छटा देखी है। शायद आने वाले 2-3 दिनों में यहाँ बारिश या बर्फबारी होगी।

मांझी के दो किलोमीटर बाद दयारा बुग्याल की ओर जाने वाले रास्ते के पास - थकान उतनी है नही जितनी शायद लग रही हो चेहरे से


डोडीताल से वापसी के रास्ते मे कई जगह हमने शॉर्टकट रास्ते का इस्तेमाल किया था जिससे लगभग दो-ढाई किलोमीटर हमें कम चलना पडा था। उसी एक शॉर्ट से लिया गया एक फोटो

शॉर्टकट के रास्ते उतराई - सामने बलबीर खडा मेरी राह देख रहा है।

अलविदा चाचा

बेवरा से वापस अगोडा की ओर

प्राथमिक विद्यालय अगोडा - ये बायीं ओर वाला लडका बलबीर का पुत्र है।

बलबीर का घर और उसकी बेटी

काशीविश्वनाथ मंदिर उत्तरकाशी - रात का समय होने की वजह से फोटो अच्छी नही आ सकी

अगले दिन उत्तरकाशी से हरिद्वार के रास्ते में उत्तरकाशी से 25 किलोमीटर दूर धरासू बेंड - यहाँ से दांयी ओर वाला रास्ता जिस पर जीपें खडी दिख रही हैं वो बडकोट होते हुए यमनोत्री जाता है जबकि बांयी ओर वाला रास्ता चम्बा होते हुए ऋषिकेश
अगले दिन यानी 25 दिसम्बर को सुबह नौ बजे वाली बस से मैं हरिद्वार के लिए निकल लिया। काफी दिनों के बाद एक ट्रैक किया, काफी आनंद आया। यात्रा का यह भाग प्रकाशित करने में हुई महीनों की देरी के लिए माफी चाहूंगा, कुछ व्यस्तता के चलते समय से नही लिख पाया। उम्मीद है आगे समय से लेखन कार्य करूंगा। आप सबका आभार !!!

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