बुधवार, 13 जून 2018

पिंडारी ग्लेशियर यात्रा: खाती से फुरकिया


14 मई 2018, सोमवार
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मैं और मोनू अपने पिंडारी ग्लेशियर अभियान पर कल गैरसैण से करीब 210 किमी बाइक चलाकर और 5 किमी ट्रैकिंग करके पिंडारी ग्लेशियर यात्रा मार्ग के अंतिम गांव खाती पहुंच गये थे। हमारा प्लान पिंडारी और कफनी दोनों ग्लेशियर देखने का था। आज हमें करीब 18 किमी की ट्रकिंग करके पिंडारी ग्लेशियर रूट पर पडने वाले अंतिम पडाव स्थल फुरकिया पहुंचना था। अब लगभग अगले तीन दिनों तक के लिए हमारा बाइक से पीछा छूट जायेगा। अच्छा ही रहेगा क्योंकि पिछले दो दिन से बाइक पर चलने के कारण पिछवाडे का बुरा हाल था। अब इसे भी कुछ शांति मिलेगी। कल रात तय किया था कि छह बजे से पहले निकल लेना है। सुबह पौने पांच बजे का अलार्म भी लगाया। लेकिन हम दोनों एक नम्बर के सोतू हैं, बल्कि मोनू तो मुझसे भी बडा सोतू है। उपर से पीडब्लूडी का बंगला भी अच्छा था, हाल-फिलहाल में ही रिनोवेट हुआ था। सोते रहे दोनों मजे में। आंखिरकार मैं ही उठा साढे पांच बजे! फ्रैश होकर मैं ढाबे पर चला गया। नाश्ते के लिए आलू के परांठों का ऑर्डर दे दिया। थोडी देर में मोनू भी आ गया। आलू का परांठा मक्खन और दही के साथ खाकर मजा आ गया। अभी तक गेस्ट हाउस का केयरटेकर भी नही आया था। खाने के भुगतान के साथ-2 गेस्ट हाउस का किराया भी हमनेंं ढाबे वाले को ही दे दिया।

2013 की आपदा के बाद अब खाती से आगे रास्ते के हालात काफी बदल गये हैं। तब पिंडर व कफनी क्षेत्र में हुई लगातार बारिश से पिंडर नदी में आई भयानक बाढ अपने साथ सभी पुलों को बहा ले गई। पिंडर नदी के किनारे बना आरामदायक रास्ता भी इस आपदा की भेंट चढ गया। हाँलाकि पीडब्लूडी विभाग वह रास्ता बना रहा है। पहले खाती से आगे टीआरसी होते हुए पिंडर नदी के किनारे मलियाधौड को जाना होता था। अब एक नया शॉर्टकट लेकिन संकरा रास्ता गांववालों ने काली मंदिर के बगल से पिंडर नदी के पार तक बना लिया है। इस रास्ते की जानकारी आपको गांव में पता करने पर मिल जायेगी। ढाबे वाले ने बताया कि अब गांव के पीछे, मंदिर वाले शॉर्टकट रास्ते से ही आना-जाना हो रहा है। ऊपर टीआरसी वाले रास्ते से अब कभी कभार ही कोई जाता है। वह रास्ता चढाई लिए हुए है और ठीक भी नही है। ढाबे वाले से इसी शॉर्टकट रास्ते के बारे मेें पता करके करीब साढे छह बजे हम लोगों ने अपनी आज की ट्रैकिंग शुरू की। खाती के बाद अगला पडाव द्वाली पडता है। खाती से द्वाली पहले 11 किमी दूर था लेकिन अब पिंडर नदी के साथ-साथ दांये-बांये होते हुए यह करीब दो किमी अधिक हो गया है। काली मंदिर के पास से होते हुए हम नीचे उतर गये। यहाँ से करीब एक - सवा किमी की हल्की हल्की उतराई लिए हुए रास्ता पिंडर तट तक पहुंच जाता है। पूरे पिंडर तट पर बडे बडे पत्थर-बोल्डर पडे हुए हैं। यहाँ गांववालों ने पिंडर पर लकडी एक कामचलाऊ पुल बनाया हुआ है जो नदी में थोडा भी ज्यादा पानी आने पर बह जाता है। बरसात का सीजन आने से पहले गांववाले इसे हटा लेते हैं और बरसात बीत जाने पर पुनः इस जगह ये पुल बना दिया जाता है। 

पुल पार कर रास्ता पिंडर नदी के बांयी किनारे के सहारे-सहारे हो जाता है। करीब एक किमी बाद निगलाधार के पास टीआरसी से आने वाला मेंन रास्ता भी इसमें मिल गया। यहाँ मेंन रास्ते पर पिंडर नदी पार कर इस ओर आने के लिए लोहे का पुल बना है। ये पुल अभी हाल -फिलहाल में ही बना है और पिछले कुछ समय से तिरछा हो रखा है। यहाँ कुछ मजदूर काम कर रहे थे। उनसे पूछने पर मालूम पडा कि पीडब्लूडी वालों की एक टीम कल यहाँ आने वाली है। वो लोग पुल को सीधा करेंगे। इस लोहे के पुल के पास यहाँ भी एक लकडी का अस्थाई पुल बना हुआ है जो अभी उपयोग में है। निगलाधार के आगे का रास्ता हल्की चढाई-उतराई लिए हुए है। रास्ते में कई छोटे - छोटे झरनेंं देखने को मिले। करीब पांच - छह किमी चलने के बाद एक ऐसे ही झरने के पास पीडब्लूडी के रेस्ट पॉइंट पर हम लोग थोडा आराम करने के लिए बैठ गये। यहाँ खाती गांव के खडक सिंह की एक छोटी सी चाय की दुकान है। आज सुबह से इधर आने वाले हम पहले शख्श थे। खडक सिंह भी अभी तक नही आया था, सो दुकान भी बंद थी। करीब बीस मिनट तक आराम कर लेने के बाद खडक सिंह आया। वैसे तो अब हम चलने ही वाले थे मगर जब पहाड में चाय मिल रही हो तो उसे छोडकर भला कौन आगे जाना चाहेगा? चाय के साथ बिस्किट का एक पैकेट भी निपटा दिया गया। कल जब मैं शाम को खाती में टहल रहा था तो चार-पांच बंगाली मिले थे। बातचीत हुई तो वो लोग भी आज सुबह छह बजे तक ही द्वाली के लिए निकलने को बोल रहे थे। खडक सिंह से उनके बारे पुछा तो वो बोला कि चार-पांच लोग आ तो रहे हैं मगर अभी कईं किमी पीछे हैं। खैर, हमें वैसे भी कौन सा उनके साथ जाना है। खडक सिंह का भुगतान कर हम निकल लिए। करीब दो किमी चलने के बाद एक विदेशी अपने पोर्टर के साथ आता मिला। विदेशी जर्मनी का निवासी है। ये लोग कफनी -पिंडारी निपटा के आ रहे हैं और कल फुरकिया में रुके थे। थोडी बहुत हाय-हैलो के बाद हम आगे बढ गये। करीब 11 किमी चलने के बाद जंगल और रास्ता दोनो एकदम से गायब हो जाते हैं। रास्ता सीधे पिंडर नदी में उतर जाता है। द्वाली यहाँ से ठीक सामने ही दिखायी पडता है। मगर उसके लिए कम से कम एक - डेढ किमी नदी तल पर चलकर जाना होता है और पिंडर व कफनी दोनो नदियांं पार करनी होती हैं। नदी तल पर रास्ते की पहचान के लिए लाल-पीले निशान लगे हुए हैं। इस पूरे ट्रैक में अगर कोई रास्ता थोडा खतरनाक है तो वो ये नदी के बेसिन वाला रास्ता है। नदी के बेसिन में चलना काफी दुखदायी होता है। कब कौन सा पत्थर डगमगा के आपके पांव में मोच दे दे, कहा नही जा सकता। पिंडर के इस किनारे से देखने पर द्वाली काफी नजदीक दिखता है, लेकिन ज्यों-2 हम उसकी ओर चलते हैं वह पीछे खिसकता जाता है। पिंडर नदी पर बने लकडी के पुल को पार कर हम नदी के दूसरे छोर पर पहुंचे तो पांच साल पहले की बाढ का तांडव देख बडी हैरानी हुई। भूस्खलन की वजह से किनारे की ओर बजरी - पत्थरों की कई मीटर ऊंची दीवार सी बन गई थी। बाढ की वजह से बने मिट्टी, रेत और छोटे-बडे पत्थरों के ढेर के बीच सिर्फ नदी का शोर सुनाई दे रहा था। इन्हें पार करने के बाद लकडी का एक और पुल दिखा। यह पुल कफनी नदी पर बना है। यहाँ से कफनी की दिशा में देखने पर बडे -बडे पत्थरों का पहाड नदी के बेसिन में दूर तक पडा दिख रहा था। पुल पार करने के बाद हल्की सी चढाई चढकर हम लोग द्वाली पहुंच गये। 

द्वाली में पीडब्लूडी और टीआरसी का एक -एक डाकबंगला है। इसके साथ ही यहाँ दो-तीन ढाबे भी हैं, जिनमें खाना और रहना दोंनो हो जाता है। इस सबके अलावा पास में ही फाइबर हट्स बनाने का काम चल रहा है। द्वाली से पिंडारी और कफनी ग्लेशियर के रास्ते अलग हो जाते हैं। दोनो ही ग्लेशियर यहाँ से बारह - बारह किमी दूर थे, जो अब बढकर करीब 14 किमी हो गए हैं। जहाँ पिंडारी के रास्ते में पांच किमी के बाद फुरकिया आता है, वहीं कफनी के रास्ते में पांच किमी के बाद खटिया आता है। करीब साढे ग्यारह बज रहे थे जब हमनें द्वाली के एक ढाबे में प्रवेश किया। अभी खाना बनने में थोडा समय था तो तब तक के लिए हम तख्त पर लमलेट हो गये। लंच करने के दौरान ढाबे वाले से कफनी के बारे में बात की तो उसने बताया कि आपदा के बाद से कफनी का रास्ता जानलेवा बना हुआ है और अकेले जाने के लिए बिल्कुल भी नही है। पांच किमी दूर खटिया में रुकने के ठिकाने के बारे पूछा तो पता चला कि ग्राम पंचायत वालों ने वहां एक गेस्ट हाउस बनाया तो है, मगर वो अभी बंद पडा है। हम कल फुरकिया से पिंडारी ग्लेशियर निपटा कर कफनी के लिए खटिया तक निकलने की सोच रहे थे। खैर, कल की कल देखेंगे जो भी होगा। लंच करके करीब साढे बारह बजे हम फुरकिया के लिए चल दिए। द्वाली से निकलते ही रास्ता थोडा चढाई लिए हुए है। जहाँ द्वाली करीब 2600 मीटर पर है वहीं फुरकिया करीब 3210 मीटर पर। थोडा चलते ही हल्की -हल्की बूंदाबाँदी होने लगी।करीब दो किमी चलने के बाद आगे वाली पहाडी के नीचे करीब चार-पांचसों मीटर दूर एक रेस्ट पाइंट दिखा तो वहां कुछ देर आराम करने की ठानी। मगर जब शेड कोई पचास मीटर रह गया तो बारिश तेज हो गई। वो पचास मीटर किसी तरह भाग कर हम यात्री शेड में पहुंचे। तेज चढाई थी तो इस पचास मीटर ने हमें हमारी औकात बता दी। कम से कम 10 मिनट लगे होंगे हमारी सांस सामान्य होने में। करीब पंद्रह मिनट बाद उपर से तीन -चार आदमी आये तो हमने पूछा अभी कितना और बचा है फुरकिया। "ढाई किमी और बचा है", ऐसा सुनते ही हमारा यहाँ का स्टॉप और बीस मिनट बढ गया। बारिश लगातार हो रही थी तो रेनकोट पहन लिए। कैमरे को रेनकोट के अंदर छुपा लिया।मगर बैग को बारिश से बचाने के लिए हमारे पास कुछ नही था। इसलिए और आधे घंटे बाद जब बारिश पूरी तरह रुक गई तब हम आगे के लिए निकले। 

साढे तीन बजे के करीब हमने फुरकिया में प्रवेश किया। खाती और द्वाली की तरह यहाँ भी पीडब्लूडी का डाकबंगला है। इसके अलावा रुकने के लिए दो फाइबर हट बने हैं। हट नये बने हैं जबकि डाकबंगला पुराना है। चाहे हट में रुके या डाकबंगले में, दोनो का किराया चार सौ रुपये है। हमनेंं हट में रुकना उचित समझा। हट अंदर से बहुत सुंदर बनी हुई थी। पांच बेड लगे थे, मगर हमने केयरटेकर को बोल दिया कि किसी और को अब ये वाली हट मत देना। उसने बोला कोई नी सर आप आराम से रुको अगर कोई आयेगा तो उसको रेस्ट हाउस दे दूंगा। फुरकिया में एक दुकान भी है जहाँ पर्यटक सीजन में चाय, नाश्ता और खाना मिल जाता है। इस दुकान को यहाँ का केयरटेकर ही चलाता है। नाम भूल गया हूँ। हट में अपने गीले कपडे बदल कर जब तक हम दुकान पर पहुंचे तब तक चाय तैयार हो गई थी। हल्की -हल्की बारिश अभी भी हो रही थी, ऐसे में जलते चूल्हे के सामने बैठकर चाय पीने का मजा कई गुना बढ गया। छह बजे के करीब तीन बंगाली लोग आये। ये लोग मुझे खाती में मिलें लोगों से अलग थे। इन लोगों ने बताया कि वो दूसरा बंगालियों का ग्रुप तो आज द्वाली में ही रुकेगा। इन लोगों में एक बाप-बेटा और एक अन्य कोई व्यक्ति था। इनमें जो अंकल जी थे वो करीब 70-75 साल के तो रहे होंगे। अंकल जी दूसरी बार पिंडारी जा रहे हैं। पिछली बार 12-13 साल पहले वो पिंडारी ग्लेशियर ट्रैक कर चुके हैं। उम्र के इस पडाव पर भी अंकल जी जितने जिन्दादिल और घुम्मकड हैं, ऐसा हमारे इधर शायद ही कोई बंदा हो। डिनर में ढाबे वाले ने आलू बडी की सब्जी और दाल बनायी। डिनर के कुछ देर बाद एक राउंड चाय का और निपटाकर हम अपने आज के ठिकाने पर सोने के लिए आ गये।   

शॉर्टकट वाले रास्ते से पिंडर नदी के तट की ओर

पिंडारे किनारे चौधरी लट्ठ ले के बैठा है। 

2013 की आपदा की कहानी बयांं करती पिंडर

शॉर्टकट वाले रास्ते पर पिंडर पर खाती गांव वालों द्वारा बनाया गया लकडी का कामचलाऊ पुल

बस भाई मोनू, जल्दी पार कर ले ! कहीं स्टाइल मारने के चक्कर में नदी में ना गिर पडिये। 

ये दोनोंं और अन्य तीसरा सफेद डोगी हमारे साथ पूरे रास्ते फुरकिया तक गये थे और अगले दिन हमारे साथ वापस भी आये। 

अब मुख्य रास्ता शुरू हो गया है। द्वाली अभी 07 नही लगभग साढे आठ किमी है। 

द्वाली के पहले के हालात -2013 के बाद से ये सीन ऐसा ही है। वो सामने जो लाल सा कुछ दिख रहा है ना, वही द्वाली है। 

अब रास्ता खत्म ! सीधे नीचे नदी में उतरोऔर बस इन पत्थरों पर कूदते -फांदते चलो। 

खो गये इन पत्थरों के बीच

मोनू और उसका नया  - नया दोस्त! दोस्तनी थी शायद!! हाहाहाहा!!!!


पिंडर नदी पर बना एक और कामचलाऊ पुल के पास मोनू। द्वाली पहुंचने के लिए अभी हमें एक पुल और पार करना है जो कफनी नदी पर बना है। 

फुरकिया में द्वाली की तरफ से आते बादल 

फुरकिया में हमारा रात का ठिकाना 

अगले दिन सुबह 

फुरकिया से थोडा आगे से दिखती नंदा खाट और पंवालीद्वार चोटी - ये फोटो भी अगले दिन का है। 

अगले भाग में जारी.........

इस यात्रा के किसी भी भाग को यहाँ क्लिक करके पढा जा सकता है।
1. पिंडारी ग्लेशियर यात्रा - हरिद्वार से गैरसैंण
2. पिंडारी ग्लेशियर यात्रा - गैरसैंण से खाती गांव
3. पिंडारी ग्लेशियर यात्रा - खाती से फुरकिया 
4. पिंडारी ग्लेशियर यात्रा - फुरकिया से पिंडारी ग्लेशियर और वापस खाती गांव
5. पिंडारी ग्लेशियर यात्रा - खाती से वापस हरिद्वार, नैनीताल होते हुए 

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