मंगलवार, 24 जुलाई 2018

पिंडारी ग्लेशियर यात्रा: खाती से वापस हरिद्वार,नैनीताल होते हुए

16 मई 2018, बुधवार
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कल शाम मैं और मोनू फुरकिया से पिंडारी ग्लेशियर देखकर वापस खाती पहुँच गए थे। पहले हमारा कफनी ग्लेशियर देखने का भी प्लान था, मगर वो कैंसिल हो गया था। हम कल शाम करीब सवा सात बजे थके हारे खाती के पीडब्लूडी गेस्टहाउस पहुँचे थे। कल हमनें एक दिन में अपने जीवन की सबसे ज्यादा ट्रैकिंग की थी - 33 किमी! थकान का आलम यह था कि जब चौकीदार ने बोला कि इस बार तो आपको पूरा किराया 450 रुपये ही देना होगा तो हमने उससे सिर्फ एक बार कहा कि यार देख ले, परसों तो तुने 200 में ही रुकवा दिया था। फिर उसने बोला कि "कल सबेरे हमारे अधिकारी साहब यहाँ आयेंगे, आज वो खलीधार वाले गेस्ट हाउस में हैं। आप 200 में ये सामने वाले ढाबे के नीचे वाले कमरे में रुक जायिये।" तब हमने भी ज्यादा बात नही की और न ही हममें दम बचा था कि हम पहले उससे बहस करें और फिर गेस्ट हाउस न मिलने पर कहीं और कमरा देखें। "ठीक है", बोलके अपने बैग गेस्ट हाउस में पटके और फैल गये आराम करने के लिए। घुटनों की शामत आ रखी थी, करीब आधा घंटा लेटकर थोडी राहत मिली। फिर मैं उठकर ढाबे पर आ गया। ढाबे वाले से गर्म पानी कराकर हाथ मुँह धुले और फिर ढाबे के पास ही थोडा टहलनें लगा। घुटने में अभी भी हल्का हल्का दर्द हो रहा था। आज यहाँ दो ग्रुप और आ रखे थे। एक ग्रुप में चार लोग थे जो शायद हल्द्वानी से आये थे। दूसरे ग्रुप में तीन लोग थे जो पास के ही किसी गाँव के रहने वाले थे। इनमेंं से एक-दो लोग गोवा में नौकरी करते हैं, वो छुट्टी पर आये हुए थे तो ये लोग पिंडारी में छुट्टियों की मौज मनाने जा रहे हैं। दोनों ही टीमों की दारू पार्टी चल रही थी शायद, क्योंकि ढाबे वाले ने उनके लिए अंडाकरी बना रखा था और प्लेट भर के सलाद डिनर से पहले ही वो लोग अपने रुम में ले गये थे। मैं भी अंडाहारी हूँ तो मैंने डिनर में अंडाकरी और दाल ली। जबकि मोनू अंडा नही खाता है, सतसंगी आदमी है तो उसने आलू की सब्जी और दाल। डिनर करने के तुरंत बाद हम लोग सोने चले गये। 

आज सुबह आराम से छहः बजे जगे। रात थके होने की वजह से बहुत बढिया नींद आयी थी। नित्यकर्म से फारिग होकर जल्दी से हम लोग चलने के लिए तैयार हो गये। बगल वाले ढाबे पर आलू परांठा और दही का नाश्ता करके हम लोगों ने अपनी वापसी की यात्रा शुरु कर दी। प्लान किया कि इस बार कुमाऊँ के रास्ते जायेंगे और अल्मोडा या नैनीताल में जहाँ तक भी अंधेरा हो जायेगा, आज रात वहींं रुक जायेंगे। करीब आधे घंटे में होटल अन्नपूर्णा पहुंचे। यहाँ पिंडारी ग्लेशियर ट्रैक की अंतिम चाय का आनंद लिया गया। खाती से यहाँ तक हमें बहुत सारे बच्चे स्कूल जाते हुए मिले। जो आस-पास बसे छोटे-छोटे गांवों जैकुनी, दऊ, उमला आदि के रहने वाले थे। इन सब गांवों में सिर्फ उमला में ही प्राथमिक विद्यालय है जबकि खाती में हाईस्कूल है। यहाँ मैंने एक बात गौर की, पांच साल से लगाकर पंद्रह -सोलह साल तक का स्कूल जाने वाला हर बच्चा हमें हाथ जोडकर "नमस्ते जी" कहकर हमारा अभिवादन कर रहा था। जबकि हम इनके लिए एकदम अंजान थे। मन बहुत प्रसन्न हुआ पहाड में इतनी दूर रहने वाले इन बच्चों के संस्कारों को देखकर। मैदान में अब ऐसा नही होता - शायद ये इंग्लिश मीडियम और कॉन्वेंट स्कूलों की देन है। इन बच्चों को देखकर हमें हमारे बचपन की याद आ गयी। हम भी बचपन में स्कूल जाते और आते समय जो भी रास्ते में मिलता था उसे ऐसे ही नमस्ते करते थे। थोडा और आगे जैकुनी गांव के पास से सुंदरढूंगा घाटी में स्थित मैकतोली चोटी के दर्शन हुए। मैकतोली के नीचे ही सुंदरढूंगा ग्लेशियर फैला हुआ है। शायद कभी सुंदरढूंगा भी देखने जाना हो! 

साढे आठ बजे के करीब उमला गांव पहुंचे। उमला में एक प्राइमरी स्कूल है। यहाँ प्रार्थना हो रही थी। बच्चों की मधुर आवाज दूर से ही हमारे कानों से होते हुए हमारे मन  मश्तिष्क को शांति प्रदान कर रही थी। बच्चे जोर - जोर से गा रहे थे।
"हे शारदे माँ, हे शारदे माँ
अज्ञानता से हमें तार देना"
माँ शारदा ज्ञान की देवी हैं। और ये नन्हे-मुन्ने हर रोज की तरह अपनी आज की पाठशाला शुरु होने से पहले माँ शारदा की आराधना कर रहे हैं। यहाँ थोडी देर रुककर हम प्रार्थना सुनते रहे। मन को बडा सुकून मिला।

सवा नौ बजे हम खरकिया पहुंचे। यहाँ अपनी "धन्नों" पिछले तीन दिनों से हमारा इंतजार कर रही थी। बगल वाले ढाबे से अपना हैलमेट और बाकी का सामान लेकर ढाबे वाले को राम-राम करके हमनें वापसी की राह पकडी। हम लोगों ने प्लान किया कि हरिद्वार तो एक दिन में पहुंचना मुश्किल है, इसलिए रास्ते में जहाँ भी कहीं अंधेरा हो जायेगा वहीं आज रुक लेंगे। बस ये शुरु के कच्चे रास्ते वाले 40 किमी थोडे दिक्कत वाले थे। उस पर विनायक धार तक तो पूरा चढाई वाला रास्ता था। जैसे इस रास्ते से आये थे, आराम-आराम से स्कूटी चलाते हुए ऐसे ही ये विनायक धार तक का रास्ता पार कर लिया। विनायक धार में हम करीब 15-20 मिनट रुके। एक - एक कप चाय पी और घर वालों को फोन करके बता दिया कि हम सही-सलामत हैं और आज वापस आ रहे हैं, कल तक हरिद्वार पहुंचेंगे। अब आगे भराडी तक और करीब 30 किमी का कच्चा रास्ता बचा था। लेकिन इसमेंं अब उतराई ही उतराई थी। कच्ची सडक और लूज पडे पत्थरों -बजरी पर उतार के समय स्कूटी फिसलने का ज्यादा खतरा रहता है। ये तीस किमी राम-नाम भजते हुए ही पार किये। कर्मी गांव के पास एक बडी अजीब घटना घटी। जब हम लोग कर्मी गांव पार रहे थे तो स्कूटी के आगे कुछ गायें चल रही थी। इनमें से एक गाय का बछडा हमारी स्कूटी के ठीक आगे आ गया। हमनेंं सही समय पर ब्रेक लगाकर स्कूटी को उस बछडे से टकराने से बचा लिया। मगर गाय को लगा कि हमने उसके बच्चे को टक्कर मार दी है और वो फुल गुस्से में हमारे पीछे दौड पडी। अपनी हवा टाइट! मोनू को कहा बेटा स्कूटी तेज भगा नही तो आज मरे! गाय माता आज हमारा काम तमाम कर देगी। गाय ने कम से कम 200 मीटर तक हमारा पीछा किया पर उपर वाले की कृपा से वो हमें कुछ नुकसान न पहुंचा सकी।
     
कर्मी के बाद का काफी रास्ता पिछले तीन दिनों में पक्का हो गया था। इसलिए करीब ग्यारह बजे तक हम लोग भराडी पहुंच गये। बडा सुकून मिला। यहाँ जिस दुकान से जाते समय पैट्रोल लिया था उसी दुकान से एक लीटर पैट्रोल और भरवाया। पौने बारह बजे तक बागेश्वर पहुंचे। यहाँ संगम से थोडा पहले ही एक ढाबे पर लंच किया। कई दिनों बाद आज लंच के दौरान टीवी देखकर खुद को दीन-दुनिया से जुडा महसूस किया। यहाँ "आजतक" चल रहा था। कल यानि 15 मई को कर्नाटक विधान सभा चुनाव के नतीजे आये थे और न्यूज एंकर उसी को लेकर गला फाड रहा था कि "कर्नाटक में भी बीजेपी की बम-बम हो गयी है लेकिन उसे पूर्ण बहुमत नही मिला है।" जैसा की अक्सर न्यूज चैनलों पर होता है 5-6 लोग चुनाव परिणामों पर अपने-अपने तर्क रख रहे थे। खैर, लंच के दौरान ही हमने ढाबे वाले से अल्मोडा के रास्ते के बारे में पता कर लिया और पेटभर खाना खाकर हम बागेश्वर से निकल लिए। पूरा रास्ता बहुत बढिया बना हुआ है। ताकुला, कसारदेवी होते हुए करीब तीन बजे तक हम अल्मोडा पहुंच गये। कसारदेवी मंदिर की इस पूरे इलाके में बडी मान्यता है। और सबसे बढके है इसकी लोकेशन, एक धार के शीर्श पर ये मंदिर स्थित है। साफ मौसम में कसार देवी मंदिर से कुमाऊँ की लगभग सभी बर्फीली चोटियां दिखायी देती हैं। अल्मोडा के रास्ते में हमने बिनसर वाल्डलाइफ सेंक्चुरी भी देखी। अल्मोडा पहुंचकर रामनगर जाने वाले रास्ते के बारे में पता किया तो एक बंदे ने बोला कि रानीखेत वाले रास्ते से निकल जाओ। मगर मुझे उस रास्ते के बारे में मालूम था, वो रास्ता काफी लंबा है। फिर मोनू ने अब तक नैनीताल भी नही देखा था सो हम नैनीताल वाले रास्ते पर निकल गये। नैनीताल से कालाढूंगी होते हुए बाजपुर - काशीपुर के लिए निकल लेंगे। हाँ, चाय की तलब लगी थी तो अल्मोडा में एक दुकान पर चाय जरूर पी ली। 

अल्मोडा से निकलते ही एकदम शानदार सडक मिली जो शायद कुछ टाइम पहले ही बनी होगी। मगर पहाड में इससे अच्छी सडक शायद ही कोई हो। जौरासी से आगे छडा के पास से एक रास्ता दाँयी ओर नदी को पार करके रानीखेत के लिए जाता है। मैं 2015 में अपने परिवार के साथ रानीखेत घूम चुका हूँ। बहुत ही अच्छी जगह है रानीखेत लेकिन सिर्फ पर्यटन के लिहाज से, घुम्मकडी के लिए वहाँ कुछ खास नही है। कैंची-धाम होते हुए करीब पांच बजे तक हम लोग भवाली पहुंचे। यहाँ से आगे का रास्ता तो अपना ही है। 2007-2009 में जब मैं रुद्रपुर में नौकरी करता था तब न जाने कितनी बार आया हूँ मैं इधर। नैनीताल-भीमताल सहित सारे ताल कईं-2 बार देखे हुए हैं। भवाली से नैनीताल पहुंचने में मुश्किल से आधा घंटा लगा। सीधे मॉल रोड पर निकल गये। शाम का समय था और गर्मियों का मौसम, मॉल रोड पर भारी भीड मिली। ये सोचकर होटल के बारे में पता नही किया कि थोडा मॉल रोड घूम लें तब किसी होटल में रुकेंगे। लेकिन थोडी देर घूमने के बाद जैसे ही पहले होटल में गये तो किराया सुनते ही होश उड गये। 2500-3000 रुपये प्रतिदिन। बाप रे!,इतने रुपये में तो हम पिंडारी ग्लेशियर देख आये हैं जितने यहाँ एक दिन रहने के माँग रहे हैं। और हमे तो सिर्फ रात भर रुकना है, सुबह होते ही हरिद्वार के लिए निकल लेना है। 3-4 जगह पता किया, मगर न तो कहीं हमारी बात बननी थी और न ही बनी। अंधेरा होना शुरू हो गया था। आगे खुर्पाताल या उसके आसपास कोई ठीक सा होटल मिलेगा तो वहाँ रुकेंगे, ये सोचकर कालाढूंगी वाले रास्ते पर निकल गये। खुर्पाताल में भी एक होटल में बात की तो वहाँ भी 2500 से कम का कमरा नही था। आगे जाने के सिवा और कोई चारा ना था, मगर ये रास्ता जिम कार्बेट पार्क से एकदम सटा हुआ है, हम चाहकर भी ज्यादा देर तक सफर में नही रह सकते थे। आंखिरकार यहाँ से करीब तीन किमी आगे सडक किनारे एक होटल में 1000 रुपये का एक कमरा लिया और खाना खाकर सो गये।    


अगले दिन सुबह सात बजे उठकर बिना नाश्ता किये ही हरिद्वार के लिए निकल लिये। कालाढूंगी में चाय नाश्ता किया। जिम कार्बेट म्यूजियम अभी शायद खुला नही था और खुला भी होता मोनू शायद ही जाता, क्योंकि उसे अब बस घर दिखायी दे रहा था। बाजपुर-काशीपुर-नजीबाबाद होते हुए करीब तीन बजे तक हम लोग हरिद्वार लौट आये। मोनू आज ही घर के लिए निकल गया। उसे मुजफ्फरनगर में कोई जरूरी काम है। बचपन के मित्र के साथ यात्रा का पूरा आनंद आया। कुछ जगह छूट गयी मगर कोई नही। आगे फिर कभी जाना होगा। 

जैकुनी गांव वालों के आलू के खेत उसके पीछे सुंदरढूंगा और पिंडर घाटी को अलग करने वाला डांडा और सुदूर सुंदरढूंगा घाटी के अंत में दिखती मैकतोली चोटी

मैकतोली चोटी - थोडा जूम करने पर

उमला प्राथमिक विद्यालय में बच्चे प्रार्थना कर रहे हैं। 

राजकीय प्राथमिक विद्यालय उमला

नैनीताल माल रोड पर नैनी झील के किनारे मोनू - ले भाई तुने कभी नैनीताल भी ना देखा था, यो भी दिखा दिया तुझे अबके! 
 आप सबका बहुत बहुत आभार!!!!     

इस यात्रा के किसी भी भाग को यहाँ क्लिक करके पढा जा सकता है।
1. पिंडारी ग्लेशियर यात्रा - हरिद्वार से गैरसैंण
2. पिंडारी ग्लेशियर यात्रा - गैरसैंण से खाती गांव
3. पिंडारी ग्लेशियर यात्रा - खाती से फुरकिया 
4. पिंडारी ग्लेशियर यात्रा - फुरकिया से पिंडारी ग्लेशियर और वापस खाती गांव
5. पिंडारी ग्लेशियर यात्रा - खाती से वापस हरिद्वार, नैनीताल होते हुए    

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