गुरुवार, 1 नवंबर 2018

नीलेश्वर महादेव से ताडकेश्वर महादेव की एक अचानक यात्रा - १

13 ऑक्टूबर 2018, शनिवार
हर रोज की तरह मैं आज भी ऑफिस गया। चुंकि प्लांट ऑपरेशन है, अत: हमारी ड्यूटी सुबह सात बजे से शुरु होती है। थोडा बहुत काम करने के बाद करीब साढे आठ बजे हम लोग चाय पीते हैं और थोडी बहुत गपशप करते हैं। हमेशा की तरह आज भी प्रदीप चाय बनाने लगा और हम ऑफिस वाले दोस्तों के बीच न जाने कैसे चर्चा शुरु हो गयी खैंट पर्वत की। कुछ महिनों पहले न्यूज में देखा था कि टिहरी गढवाल में कोई खैंट पर्वत है जहाँ एक माता का मंदिर है जिसमेंं रात को परियां आती हैं। न्यूज में दिखाया गया था कि सचमुच उस मंदिर में कुछ दैवीय शक्ति है। न्यूज वालों के पास कोई मीटरनुमा मशीन थी जो करीब आधी रात के समय मंदिर के आसपास खैंट पर्वत पर किसी कॉस्मिक एनर्जी या दैवीय शक्ति की मौजूदगी दर्शा रही थी। हम लोग बात करने लगे कि यार यहाँ चला जाय। गूगल बाबा से पूछा कि कहाँ है ये खैंट पर्वत तो पता चला कि टिहरी बांध पार करके करीब 15-20 किमी घनसाली रोड पर चलने के बाद एक रास्ता उल्टे हाथ को कटता है जो भिलांगना नदी पार करके आगे थाट गांव जाता है, जहाँ से खैंट पर्वत स्थित मंदिर तक पांच किमी का पैदल रास्ता है। कल संडे है तो आज चलने की बात होने लगी। हरिद्वार से थाट गांव की दूरी देखी तो 160 किमी के करीब। मतलब, अगर आज जाना है तो तुरंत निकलना होगा। हिसाब, किताब नहींं बना यहाँ जाने का और इस "परियों के देश" को भी "फिर कभी" वाली लिस्ट में डाल दिया गया, जिसमेंं पहले से ही न जाने कितने डेस्टिनेशन पडे हुए हैं। फिर बात चली सुरकंडा देवी जाने की। सुरकंडा देवी मंदिर के बारे में तो आप सब जानते ही होंगे। चम्बा से धनोल्टी रोड पर कद्दूखाल के पास वाली पहाडी पर स्थित है। मेरे ऑफिस के कई लोग यहाँ जा चुके हैं। मेरा ही बचा है। आजकल नवराते भी चल रहे हैं। मन करने लगा कि सुरकंडा देवी चला जाय। फिर से दूरी नापने के लिए गूगल बाबा की शरण ली। इसी बीच प्रदीप चाय भी ले आया। 

चाय की चुश्कियों के साथ सुरकंडा जाने का विचार जोर पकडने लगा। इसी बीच एक और जगह के बारे में हमारा "डिसकशन" शुरु हो गया। आशीष अभी 2-3 महीने पहले लैंसडोन से आगे कहींं किसी महादेव मंदिर गया था। क्या नाम था उस मंदिर का? -- हाँ याद आया, ताडकेश्वर महादेव मंदिर। लैंसडोन से करीब 4 किमी पहले एक रास्ता सीधे हाथ को नीचे की तरफ उतरता है जो रिखणीखाल होते हुए आगे बीरोंखाल तक जाता है। रिखणीखाल यहाँ से करीब 50 किमी दूर है। जबकि इसी रास्ते पर करीब 32 किमी चलने के बाद एक जगह आती है "चौखुलियाखाल"। यहाँ से उल्टे हाथ को एक रास्ता कटता है जो पांच किमी दूर स्थित ताडकेश्वर महादेव तक जाता है। ये पूरा इलाका "अनक्सप्लोरड" है और इधर काफी कम ही लोग जाते हैं। हाँ, सावन के महीने में बाकी और शिवालयों की तरह यहाँ भी थोडी बहुत भीडभाड हो जाया करती है। चाय खत्म होते-2 मन बना लिया कि आज भोले बाबा के पास ही चला जाय - मातारानी से माफी मांग ली गयी। वैसे भी नवराते हैं तो उधर काफी भीड मिलने की पूरी - पूरी उम्मीद थी। ऑफिस के किसी अन्य साथी ने जाने में कोई खास रुची नही दिखाई और न ही मुझे इसकी जरुरत थी। अपनी ज्यादातर यात्राएं वैसे भी अकेले ही होती हैं। ताडकेश्वर महादेव भी हरिद्वार से करीब 150 किमी दूर है इसलिए करीब 11 बजे मैं अकेला ही हरिद्वार से इस यात्रा के लिए निकल लिया। सीधे हरिद्वार बाइपास से होता हुआ मैं चंडी चौक पहुंचा और नजीबाबाद वाला रास्ता पकडा। जहाँ से चंडी देवी जानेवाले उडनखटोले उडते हैं, वहां से करीब 100-200 मीटर आगे जाने पर उल्टे हाथ की तरफ नील पहाडी है और इसी पर स्थित है नीलेश्वर महादेव मंदिर। आप लगभग सभी लोग कभी न कभी हरिद्वार जरुर आये होंगे लेकिन भोले की नगरी में कम लोग ही भोलेनाथ के इस छोटे से धाम जाते हैं। काफी पौराणिक महत्व है इस मंदिर का भी। शिव महापुराण में इस मंदिर का उल्लेख मिलता है। नीलेश्वर महादेव मंदिर भी दक्षेश्वर मंदिर के काल से ही यहां स्थित हैं। श्रवण मास में यहां पर विशेष पूजा अर्चना होती है। शिव महापुराण में वर्णन है कि सती के हवन कुंड में आत्मदाह करने के बाद, शिव ने अपने गणों को दक्ष प्रजापति का यज्ञ नष्ट करने के आदेश दिए थे। ऐसी श्रुतियां हैं कि भगवान शंकर के क्रौध के कारण ही यह पहाड नीला होकर नील पर्वत के नाम से प्रसिद्ध हुआ।  मैं एक बार नीलेश्वर महादेव मंदिर जा चुका हूँ,तो इस बार भी जैसे ही इसके पास से गुजरा तो भोलेबाबा के दर्शन करके ही आगे बढा। और इस यात्रा को नाम दिया "नीलेश्वर महादेव से ताडकेश्वर महादेव की यात्रा"।

नीलेश्वर महादेव के दर्शन करके मैं आगे कोटद्वार के ओर निकल लिया। चिडियापुर उत्तराखंड - यूपी बोर्डर से थोडा पहले एक रास्ता पूर्वी गंग नहर के साथ- साथ जाता है, इस रास्ते से कोटद्वार जाने वालों को नजीबाबाद जाने की जरुरत नही पडती। शुरु में रास्ता काफी टूटा हुआ है लेकिन 5-7 किमी के बाद अच्छा बना हुआ है। आराम से साढे बारह बजे तक कोटद्वार पहुंच गया। ठीकठाक भीड वाला कस्बा है कोटद्वार। यहाँ सिर्फ स्कूटी के टंकी फुल करायी और आगे के लिए निकल लिया। कोटद्वार में हाँलाकि सुप्रसिद्ध सिद्धबली मंदिर है, लेकिन इसे कल वापसी के दौरान देखने के लिए छोड दिया। चुंकि घर से बिना खाना खाये ही चला था इसलिए अब भूख लगनी शुरु हो गई थी। करीब 10 किमी चलने के बाद एक ढाबे पर खाना खाया तो पेट को शांति मिली। यहाँ से थोडी देर बाद दुगड्डा पहुंचा। यहाँ से एक रास्ता पता नही कहाँ - 2 और अंत में नीलकंठ महादेव होते हुए ऋषिकेश के लिए जाता है। यहाँ से नीलकंठ महादेव 92 किमी दूर है। ये रास्ता भी बहुत कम लोगों का देखा हुआ है। वापसी के समय देखुंगा अगर इस रास्ते से जा पाया तो! दुगड्डा से थोडा आगे से एक रास्ता गुमखाल होते हुए पौडी जाता है जबकि दूसरा रास्ता लैंसडोन,जहरियाखाल होते हुए गुमखाल और आगे पौडी जाता है। मैं लैंसडोन वाले रास्ते पर हो लिया। थोडा चलते ही चढाई शुरु हो गयी और साथ ही चीड का जंगल भी आ गया। चीड का जंगल बहुत ही सुंदर लगता है और चीड के जंगल में सुंदर नजारों को अपने कैमरे में कैद करने के लिए लैंसडोन से करीब 10 किमी पहले एक जगह मैंने अपनी स्कूटी रोकी और जी भर के फोटो लिये। लैंसडोन से चार किमी पहले ही रिखणीखाल वाले रास्ते पर मुड गया। शुरु में करीब 10 - 12 किमी तक रास्ता उतराई का है। मेरे आगे एक जीप जा रही थी तो मैंने इसके पीछे पीछे ही चलने में अपनी भलाई समझी। करीब 15 किमी दूर सिसल्डी में मैंने इस जीप को पीछे छोडा। इस 15 किमी के रास्ते में मुझे विभिन्न जगहों के बारे में जानकारी देते कई बोर्ड लगे दिखाई दिये, मगर इनमेंं से किसी भी जगह का नाम मैंने आज से पहले कभी नही सुना था।

शाम को पांच बजे के आसपास मैं ताडकेश्वर मंदिर पहुंच गया। लैंसडाउन से 32 किमी दूर चौखुलियाखाल से ताडकेश्वर महादेव तक पांच किमी का पक्का रास्ता बना हुआ है। रास्ते में एक गांव भी मिला जहाँ रुकने खाने का इंतजाम था, मगर मैं ये सोचकर आगे निकल गया कि मंदिर पर ही किसी धर्मशाला में रुकूंगा। जहाँ सडक खत्म होती है वहीं थोडी से खाली जगह पडी है जिसमेंं यहाँ आने वाले लोग अपनी गाडियां पार्क करते हैं। यहाँ एक पेड के नीचे मैंने भी अपनी स्कूटी पार्क कर दी। मेरे साथ - साथ ही यहाँ दो गाडियां और आकर रुकी। जिनमें दो परिवार मेरठ से आये थे। मूल रुप से ये लोग यहीं आसपास के ही रहने वाले हैं जो पिछले कुछ वर्षों से मेरठ में रह रहे हैं। ये लोग हर साल कम से कम एक बार तडकेश्वर बाबा के दर्शन करने और यहाँ भंडारा करने जरूर आते हैं। इस बार इनके साथ ही मेरठ में इनके पडोसी एक अंकल जी भी आये हुए हैं। बातचीत हुई तो उन अंकल जी के साथ अपनी दोस्ती होनी तय ही थी। ये अंकल जी भी मेरी तरह पहली बार ही ताडकेश्वर आये हैं। पर्किंग के बांयी ओर से नीचे मंदिर तक जाने के लिए थोडी सी सीढियां बनी हुई हैं, फिर आगे करीब 100 मीटर का रास्ता तय करके मंदिर के पास बने एक आश्रम में हम लोग पहुंचे। मेरठ से आये हुए परिवारों ने यहाँ आश्रम में अपने लिए पहले ही कमरे बुक करा रखे थे, आश्रम वाला भी वैसे इनके जान-पहचान वाला ही है। शुरु में तो आश्रम के केयर टेकर ने मुझे भी इन्ही का साथी समझ लिया, सो सबके साथ फ्री में मुझे भी चाय मिल गयी। चाय पीने के बाद मैं और वो अंकल जी भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए निकल लिये। बाबा के दर्शन करके जब हम लौटे तो अंधेरा होने लगा था और आश्रम के केयर-टेकर को मेरी असलीयत भी पता चल चुकी थी! इसलिए उन सभी लोगो को होटल में ही रुकवाया गया और मुझे नीचे धर्मशाला में रुकवाया गया, वो भी एक रात के पांच सौ रुपये! अंधेरा हो चुका था और अब ऐसे में मेरे पास यहाँ रुकने के अलावा वापस जाने का ऑपशन भी नही था। इसलिए इधर ही रुक लिया। सारी फोर्मलिटी पूरी करके केयर - टेकर मुझे मेरे रुम में छोड गया। जब से उसे पता चला था कि मैं उस ग्रुप से नही हूँ, तब से मेरे प्रति उसका रवैया भी बदल गया था। "आठ बजे खाना मिलेगा, उपर खाना खाने आ जाना"। मैं खाली खडा उसे देख रहा था। "बर्तन खुद से धोना होगा"। ऐसे ही 2-4 फरमान सुनाकर वो केयर-टेकर चला गया। पूरी धर्मशाला में मैं अकेला था। थोडी देर में ही सन्नाटा मुझे काटने को दौडने लगा। सन्नाटे में भी एक अजीब सी आवाज सुनाई दे रही थी। सन्नाटे की भी आवाज होती है इसका मुझे आज हल्का-2 अहसास हो रहा था। थोडी देर ध्यान लगाने की कोशिश भी की, मगर पंद्रह - बीस मिनट से ज्यादा ध्यान नही लगा सका। वैसे भी मैं कोई ध्यानी नही हूँ, बस किसी तरह रात के खाने का समय होने तक खुद को बिजी रखने के लिए थोडी कोशिश की थी। खैर किसी तरह आठ बजे और मैं उपर आश्रम में खाना खाने भागा।.....    


नीलेश्वर महादेव मंदिर और शिवलिंग

लैंसडाउन से थोडा पहले चीड का जंगल

नीलेश्वर बाबा की जय हो!!

लैंसडाउन से 4 किमी पहले वाला तिराहा। यहाँ से सामने वाला रास्ता ताडकेश्वर, रिखणीखाल जा रहा है जबकि बांयी ओर वाला रास्ता लैंसडाउन
न जाने कौन - कौन सी जगहें हैं ये। 

इधर से भी कोई रास्ता सतपुली के लिए जाता है। 


चौखुलियाखाल

ताडकेश्वर मंदिर तक पहुंचने के लिए इन सीढियों से होकर गुजरना होगा। 
आश्रम के पास से मंदिर की ओर जाता रास्ता
बहुत अच्छी जानकारी
ताडकेश्वर के बारे में कुछ जानकारी
मेरठ से आये ग्रुप में से एक लेडी अपने बेटे को घंटी बजवाते हुए।













मेरठ वाले चाचा दर्शन करने को जा रहे हैं। 


एक बार और जय बाबा ताडकेश्वर

चौखुलियाखाल से आगे रिखणीखाल और बीरोखाल तक जाने वाले रास्ते की जानकारी इस बोर्ड पर लिखी है। यह मार्ग सन 1931 से बनना आरम्भ हुआ और 1942 मे खत्म हुआ। 
अगले भाग में जारी...... 

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह khent पर्वत के बारे में बहुत सुन रखा है...ताड़केश्वर धाम बहुत ही खूबसूरत है

    जवाब देंहटाएं