सोमवार, 26 सितंबर 2016

श्रीखंड महादेव: वापसी की यात्रा

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29 जुलाई, दिन शुक्रवार।
हमारी श्रीखंड यात्रा का आज पांचवा दिन था। कल मैंने श्रीखण्ड बाबा के दर्शन किए थे। और आज हमें अपनी वापसी की यात्रा शुरू करनी थी। आराम से साढे छह बजे सोकर उठे। नित्य कर्म से फारिग होकर चाय मैगी खायी और टेंटवाले का हिसाब करके चल पडे। भीमद्वार में हम लोग तीन दिन रुके थे। तीन लोगो के 350 रुपये प्रतिदिन पर-आदमी के हिसाब से 3000 रुपये बने। आज हम बहुत खुश थे, आंखिर यात्रा सफलतापूर्वक पूरी करके जा रहे थे ! दोनो में से किसी को भी कोई खास परेशानी नही हुई थी। मेरी थकान भी रात आराम करने से खत्म हो गयी थी और अनंत तो यहाँ कल से ही आराम फरमा रहा है। करीब सवा सात बजे हम लोग भीमद्वार से निकले। तय किया कि आज ही जांव तक वापस पहुँचेंगे। आज हमे ज्यादातर जगहों पर उतराई वाले रास्तों पर ही चलना है, बस कहीं-2 पर ही थोडी बहुत चढाई है। शाम - अंधेरा होने तक जांव पहुंच ही जायेंगे।
भीमद्वार में सुबह हमारे टेंट का अंतिम फोटो
आज मौसम साफ था, धूंप निकली हुई थी। करीब दो किलोमीटर चलने पर वो दोनो गुजराती बंदे मिले जो कल मेरे साथ दर्शन के लिए गये थे। वो लोग भी कल शाम को अंधेरा होने तक भीमद्वार ही आ गये थे। उन गुजरातियों का तीसरा, वो मोटा साथी कल ही यहाँ से भी निकल लिया था और आज इन लोगो को थाचडू में मिलेगा। बस, अब तो हम तीन से पांच हो गये ! साथ-साथ ही चलते रहे। कुंसा पहुंचकर फिर से सूप का ऑर्डर दे दिया गया।  यहाँ आज भी भेड़ें उपर के पहाड वाले घास के मैदान में विचरण कर रही थी। यहाँ कुंसा में ही इन भेड़ों के मालिक "गद्दियों" के ठिकाने भी बने थे। पूरे हिमाचल के ऊँचे से ऊँचे घास के मैदानों पर इन्ही गद्दियों का राज है। बर्फबारी के समय में ये लोग नीचे कम ऊंचाई वाले स्थानों पर चले जाते हैं और गर्मियों में जब बर्फ पिंघलती है तो ये फिर से इन ऊंचे इलाकों में आ पहुंचते हैं। यहाँ भी जब नवम्बर-दिसम्बर में बर्फ पड जायेगी तब ये लोग नीचे वाले स्थानों पर चले जायेंगे और मई - जून में फिर यहाँ आ जमेंगे। असल में ये गद्दी ही हिंदुस्तान के सबसे बडे घुमक्कड हैं। खैर, करीब बीस मिनट कुंसा में रूककर और सूप निपटाकर हम चल दिये।

दयाल चाइनीज कॉर्नर - यहाँ सूप बडा मस्त बना था। आते और जाते समय दोनो बार यहाँ सूप पिया गया।
करीब सवा दस बजे हम लोग भीमतलई पहुँचे। यहाँ हमने चाय पी और अनंत व गंगाराम ने परांठे भी खाये। मुझे पहाड पर यात्रा करते समय भूख कम ही लगती है और वैसे भी हमने अभी करीब एक घंटा पहले एक कटोरा भर के सूप पिया ही था। अब बस थाचडू में लंच ही करूंगा। भीमतलई में हम लगभग आधा घंटा रूके। यहाँ से निकले तो सामने वो कालीघाटी की जबरदस्त चढाई मुँह उठाये खडी थी जिसको हमने तीन दिन पहले उतरा था। यहीं पर वो पार्वती बाग वाले अंकल जी मिल गये जिन्होने मुझे दर्शन के लिए जाने के लिए प्रेरित किया था। वो कल सबेरे के पार्वती बाग से चले हुए थे और आज शाम तक किसी तरह थाचडू पहुँचेगे। अंकल जी ने जब पूछा कि दर्शन किए क्या तो उनको बडी खुशी से बताया कि हम सभी दर्शन करके ही आये हैं। अंकल जी को आंखिरी राम-राम करके हम लोग आगे निकल गये। भगवान करे इन घुमक्कड अंकल जी से फिर से मिलना हो ! ले -दे कर किसी तरह से कालीघाटी की चढाई पूरी की। अब तो बस सिंहगाढ तक पूरी उतराई ही उतराई है - डंडाधार की उतराई जो आते समय भयानक चढाई थी।
 
दो बजे थे जब हम थाचडू पहुँचे। यहाँ हमे हरियाणा वाले वो बंदे भी मिल गये जो कल मेरे साथ श्रीखंड गये थे। वे यहाँ लंच कर रहे थे। राजमा चावल बने थे,बस हम भी टूट पडे। थाचडू में ही गुजरातियों का वो तीसरा साथी भी मिल गया जो पार्वती बाग से वापस आ गया था। खा-पीकर और आधा घंटा अराम करके निकल थाचडू से चल दिये। डंडाधार की इस चढाई ने जितना आते समय परेशान किया था उतना ही ये अब उतरते समय भी परेशान कर रही थी। पिछले दो-तीन दिनों में बारिश होने की वजह से रास्ते में कीचड भी हो गया था। इसलिए हम लोग धीरे-धीरे ही चल रहे थे। थाटीबील से करीब एक किलोमीटर आगे से मेरे घुटने में दर्द होने लगा था। जिस वजह से मुझे अब उतरने में और भी परेशानी हो रही थी। एक ही पैर के सहारे उतरना पड रहा था। उधर अनंत के पैर में छाला पड गया था तो थाचडू से पूरे रास्ते वो नंगे पैर ही चल रहा था।
 
बराठी नाले तक आंखरी आधा किलोमीटर में मुझे काफी दिक्कत हुई और मैं सबसे पीछे रह गया। बस गुजराती भाई, मेहुल जी ही मेरे साथ थे। उनको भी घुटने में दिक्कत हो रही थी। खैर धीरे-धीरे उतरते हुए हम दोनो भी किसी तरह बराठी नाले पर पहुँच ही गये। यहाँ हरिद्वार वाले एक बाबा का छोटा सा आऋम है। यहाँ सब लोग बैठे मिल गये - हमारे साथ वाले भी और हरियाणा वाले भी। यहाँ चाय और शक्कर पारे खाने को मिले। मजा आ गया। करीब सवा पाँच बजे थे जब हम यहाँ से निकले। अब बस सिंहगाढ तक की थोडी से मेहनत बची थी। सिंहगाढ-बराठे नाले का ये ढाई किलोमीटर का सफर पूरी श्रीखंड यात्रा का सार है। बस कैडा-सा जी करके पार कर दिया ये सफर भी।
 
सवा छह बजे तक सिंहगाढ पहुंचे तो प्रशासन वाले मिले जिन्होने रजिस्ट्रेशन किया था। पूछने लगे कि अभी और भी लोग बचे हैं क्या? हमने कहा एक अंकल जी तो बचे हैं जो कल तक आयेंगे बाकी का हमें पता नी। यहाँ से अब जांव पहुँचने में हमें कोई दिक्कत नही थी। सीधा-सीधा रास्ता जो था जांव तक। फिर भी हमें जांव पहुँचते-पहुँचते अंधेरा हो गया। गंगाराम हमारे साथ जांव तक आया। यहाँ से अब वो पैदल पाँच किलोमीटर दूर अपने गांव जायेगा। हमसे बिछुडते वक्त हमें गंगाराम के चेहरे पर कुछ करुणा के भाव भी दिखे। आंखिर पिछले पांच दिनो में अपनी दोस्ती जो हो गयी थी। गंगाराम को विदा करके हमने आज यहीं जांव में ही रूकने का फैसला किया। हाँलाकि अभी केवल आठ ही बजे थे और हम अभी भी बागीपुल पहुँच सकते थे। मगर आज 25 किलोमीटर पैदल चले थे। शरीर में दम बिल्कुल नही था कुछ भी करने का। यहीं जांव में ही जहाँ बाइक खडी की थी उसी होटल में एक कमरा लिया। डिनर किया और बस पड के सो गये।
 
अगले दिन सुबह आठ बज गये थे जब हम जांव से चले। अरे हाँ, याद आया बागीपुल में तो फौजी अंकल के यहाँ हमारा बाकी का सामान भी रखा है। बागीपुल से बाकी का सामान उठाया और निकल लिए वापस। हमारी वापसी की यात्रा में पूरे रास्ते बारिश होती रही और हम दो दिन में हरिद्वार पहुंचे। हमारी श्रीखंड यात्रा बिना किसी खास समस्या के पूरी हो गयी थी। वापसी में पूरे रास्ते एक ही बात दोहराते आए कि अब दो-चार महीने तक कोई ट्रेकिंग कोई यात्रा नही की जायेगी। मगर जैसे ही एक आध महीना बीतेगा तो घुमक्कडी का कीडा फिर से जोर मारेगा और शायद फिर हम कहीं निकल लें।
 
बम शंकर - हर हर महादेव
 


 
 
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