मंगलवार, 9 मई 2017

केदारनाथ यात्रा: हरिद्वार से गुप्तकाशी

30 अप्रैल 2017, रविवार
परसों यानी 28 अप्रैल को अक्षय त्रितीया थी। इसी दिन गंगोत्री और यमनोत्री मंदिर के कपाट खुल गये और उत्तराखंड की सुप्रसिद्ध चार - धाम यात्रा शुरू हो गई। यमनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा ही चार धाम यात्रा कही जाती है। अभी केदारनाथ और बद्रीनाथ के कपाट खुलने बाकी हैं जो क्रमश: तीन और छह मई को खुलेंगे। उसके बाद यात्रा पूरे जोर शोर से चलेगी। देश, दुनिया के कोने - कोने से लोग यात्रा के लिये उत्तराखंड पहुंचेंगे - कोई भक्ति के लिए तो कोई "एड्वेंचर" के लिए। इन चारों धामों में अकेला केदारनाथ धाम ही ऐसा है जिसके लिए काफी मेहनत-मशक्कत करनी पडती है। हालांकि यमनोत्री में भी पांच किलोमीटर पैदल चलना पडता है लेकिन केदारनाथ की 17 किलोमीटर की मेहनत के आगे वो कुछ भी नही है। बाकि गंगोत्री और बद्रीनाथ में तो पैदल चलने की जरूरत ही नही, यहाँ सीधे वाहन से पहुंच सकते हैं।

मैं भी काफी समय से केदारनाथ या गंगोत्री की यात्रा करना चाहता था। इसी बीच मेरे बचपन के दोस्त अमरदीप अका "मोनू" का फोन आया कि भाई गंगोत्री वगरह कहीं घूमने चलना है। साथ ही मेरे स्कूल के दोस्त विकास ने पूरी चार धाम यात्रा करने की इच्छा प्रकट की। इधर मैं तो बस तैयार सा बैठा था कहीं जाने के लिए। 1-2 अप्रैल में पराशर लेक जाने की प्लानिंग भी बस टिकट बुक कराने के बाबजूद फेल हो गयी थी। इस बार ऑफर किसी दूसरी तरफ से आया तो फट से हाँ हो गई। विकास को मनाया गया कि भाई देख, चार धाम यात्रा करने में कम से कम दस दिन का समय चाहिए और कम से कम मेरे पास तो इतना टाइम है नी। उपर से यात्रा स्कूटी से करनी है और चारों धाम कवर करने में कम से कम 1500-1600 किलोमीटर हो जायेगा तो इतनी स्कूटी चलाने का भी मिजान ना है मेरा! इस पर विकास ने बोला कि भाई और कहीं जाऊं या ना जाऊं मगर केदारनाथ जरूर जाउंगा  - आंखिर ज्योतिर्लिंग है केदारनाथ। साथ में हमारे ही मुहल्ले का एक और शख्श "पंडतजी" भी साथ चलने की बात करने लगा। 

अब कुछ परिचय मोनू, विकास और "पंडतजी" का हो जाये ताकि आप लोगो को भी इन तीनों के बारे में कुछ जानकारी मिल सके। तो जी, मोनू मेरे बचपन का मित्र है। उसका घर हमारे घर के बगल में ही है। बचपन में कबड्डी खेलना हो, चोर-पुलिस हो या फिर क्रिकेट सारे गेम्स हमने साथ-साथ ही खेले। हालांकि स्कूल में वो मेरे से एक क्लास पीछे था। मोनू का मेरठ-गाजियाबाद में वीडियो एडीटिंग का काम है। आज भी जब मैं गॉव जाता हूँ तो और किसी से मिलूं या न मिलूं मगर मोनू से जरूर मिलता हूँ। दूसरा बंदा - विकास। गॉव में स्कूल में हम साथ पढे हैं, बहुत अच्छे मित्र हैं। विकास का नानका हमारे गांव में है - जबकि उसका घर गाजियाबाद के लोहिया नगर में। विकास की लोहिया नगर में एक टायर की एजेंसी है और एक गिफ्ट शॉप। तीसरा शख्श - "पंडत जी"। असली नाम शायद मोहित ही है इसका भी लेकिन हम सभी लोग इसे "पंडत" ही बुलाते हैं। गॉव में फोटोग्राफी का काम है, बहुत अच्छा काम चल रहा है। उम्र में हम तीनों से 4-5 साल छोटा है तो ऐसी कुछ खास दोस्ती नहीं है। 

मोनू और विकास से फोन पर बात हुई। तय हुआ कि केदारनाथ, त्रियुगीनारायण, तुंगनाथ और बद्रीनाथ जायेंगे। 29 अप्रैल, शनिवार को हरिद्वार से निकलने का प्लान किया गया। उधर केदारनाथ का नाम सुनते ही "पंडतजी" के घर वाले घबराने लगे। उसके पापा ने उसको जाने से मना कर दिया और हम तीन लोगो के हिसाब से ही प्लानिंग करने लगे। 29 तारीख की सुबह विकास और मोनू गाजियाबाद से निकल लिए। करीब बारह बजे मैंने फोन किया तो पता चला पठ्ठे पिछले एक घंटे से खतौली में हैं, "पंडत" आ रहा है गांव से, उसका इंतजार कर रहे हैं! आंखिर किसी तरह घरवालो को मनाकर "पंडत" हमारे साथ चलने वाला है।

पांच बजे के करीब एक स्कूटी पर लधकर ये तीनों लोग मेरे यहाँ पहुंचे। आज ही हरिद्वार से निकलने का प्लान तो अब कैंसिल हो ही चुका था। शाम का टाइम काटने के लिए हम लोग केदारनाथ और बद्रीनाथ यात्रा के लिए रजिस्ट्रेशन करा आये। उत्तराखंड में अब चार धाम यात्रा के लिए बायोमेट्रिक रजिस्ट्रेशन होने लगे हैं। हरिद्वार में ये रजिस्ट्रेशन मुख्य बस अड्डे के पास होटल राही में होते हैं। डिनर निपटाकर कल सबेरे निकलने की प्लानिंग शुरू की। अब तक भी हमारा प्लान वो ही था जो उपर लिखा है। मगर "पंडतजी" ने सब गुड गोबर कर दिया। एक तो पट्ठा कोई भी गर्म कपडा नही लाया था और उपर से उसके पास सिर्फ 5 दिन थे। हर हाल में 5 मई को उसे गांव पहुंचना था। कोई बुकिंग थी उसकी। हमने उपर लिखी चारों जगह जाने की बात की तो पट्ठा बोला कि मेरे पास तो इतना समय नही है तुम तीनों निकल जाओ, मैं कल सबेरे की बस पकडकर गांव चला जाउंगा। जबकि केदारनाथ जाने का उसका इतना मन था कि घरवालों के लाख मना करने पर भी किसी तरह वो आ ही गया था। हाँलाकि मुझे थोडा सा गुस्सा भी आ गया ये सुनकर। मैंने कहा, "जब तेरे पास टाइम नही है और तुझे घर ही जाना है तो यहाँ तक क्या ऐसी-तैसी कराने आया है तू।" खैर, आंखिर हम सबने भी 5 तारीख तक उसके साथ ही वापिस आने की रजामंदी कर ली। साथ ही अपनी एक जैकेट मैंने "पंडतजी" को दे दी।

केदारनाथ के कपाट तीन मई को खुलेंगे। हमें एक दिन पहले अर्थात 2 तारीख को शाम तक केदारनाथ पहुंचना है। हमारे पास पूरे तीन दिन का समय है वहां पहुंचने के लिए। तीन मई को ही कपाट खुलने के समय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी भी केदारनाथ आने वाले हैं। अगले दिन 30 अप्रैल को हम लोग यानी मैं, मोनू, विकास और "पंडतजी" हरिद्वार से अपनी केदारनाथ यात्रा पर निकल लिए। दो स्कूटी थीं - विकास की और मेरी। करीब साढे छह बजे हम मेरे कवाटर से चले। हमेशा की तरह ऋषिकेश जाने के लिए चीला वाला रास्ता पकडा। सुबह के समय पूरा रोड खाली पडा था। रास्ते में कई जगह सडक पर हाथी का गोबर पडा मिला। आंखिर ये राजाजी राष्ट्रीय पार्क है और इस जगह पर हाथियों की भरमार है। घंटे भर में ऋषिकेश पहुंचे तो एक ढाबे पर नाश्ता करने के लिए रूक गये। आलू के परांठे और चाय का आदेश दे दिया गया।आज सुबह से ही बादल से हो रखे थे। हल्की - हल्की बूंदाबांदी होने लगी और हम लोग चाय परांठों पर टूट पडे। करीब सवा घंटे बाद बारिश रुकने पर हम लोग आगे बढे।

बयासी तक पहुंचे ही थे कि फिर से बूंदाबांदी शुरू हो गयी। मौसम ठंडा हो ही गया था, बारिश का फायदा उठाकर बयासी में भी एक चाय निपटा दी गई। करीब पंद्रह मिनट यहाँ रूककर आगे बढे। अब तक हम कुछ ज्यादा ही रुकते-रूकाते चल रहे थे इसलिये निर्णय किया कि अब सीधे श्रीनगर में ही रुकेंगे वो भी लंच के लिए। करीब साढे ग्यारह बजे देवप्रयाग पहुंचे, यहाँ बिना रुके ही निकल गये। श्रीनगर से करीब दस-बारह किलोमीटर पहले एक अच्छी सी लोकेशन दिखी तो कुछ देर रुककर फोटो खींचने का कार्य चला। एक बजे के करीब श्रीनगर पहुंचकर एक ढाबे के पास मैं और मोनू रुक गये। विकास और "पंडतजी" हमारे पीछे ही आ रहे थे मगर न जाने कब वो हमसे आगे निकले हमें पता ही नही चला। खामाखां मैं और मोनू श्रीनगर में 15-20 मिनट रुके रहे। फिर "पंडतजी" को फोन किया तो पता चला वो लोग तो श्रीनगर से 4-5 किलोमीटर आगे निकल चुके हैं। उनको वहीं रुकने को बोला और तेजी से हम लोग श्रीनगर से निकल लिए। धारी देवी मंदिर से थोडा पहले एक बार फिर बारिश आ गई और हमें एक दुकान में शरण लेनी पडी। भूख लग ही रही थी। मैगी और कोल्ड-ड्रिंक का लंच किया गया।

चार बजे के करीब अगस्तमुनि पहुंचे। अगस्तमुनि, रुद्रप्रयाग के बाद केदारनाथ वाले रास्ते पर करीब 15 किलोमीटर दूर एक कस्बा है। "पंडत" यहाँ अगस्तमुनि के आश्रम की खोज में था। मगर यहाँ सिर्फ अगस्तमुनि के नाम पर एक मंदिर है कोई आश्रम नही है। मंदिर जाना कैंसिल कर, अगस्तमुनि पार करके हम लोग उसी पैट्रोल पम्प के पास रुके जहाँ साल 2015 में अपनी देवरिया ताल - तुंगनाथ यात्रा के दौरान मैं, विनोद और विवेक रुके थे। यहाँ मंदाकिनी के किनारे पर जाकर कुछ फोटो खींचे और फिर एक-एक चाय पीकर गुप्तकाशी के लिए निकल लिए। आज हमारा प्लान गुप्तकाशी तक पहुंचने का ही था। क्योंकि हमारे पास कल का पूरा दिन पडा है गौरीकुंड पहुंचने के लिये। करीब छह बजे तक बडे आराम से हम गुप्तकाशी पहुंच गये। यहाँ आकर समझ आ गया कि शीघ्र ही केदारनाथ यात्रा शुरू होने वाली है। सारे होटल-धर्मशालायें सज रही हैं, पेंटिंग का काम चल रहा है। कई होटल में पता करने के बाद बडी मुश्किल से एक होटल में कमरा मिला। चार लोगों के लिए हजार रुपये में, गीजर सुविधा के साथ। अगले कुछ दिनों के बाद ही इस कमरे का रेट कम से कम 1200-1500 हो जायेगा। करीब एक घंटा आराम करके हम लोग डिनर के लिए निकले। यहाँ भी हमारे आने के बाद अच्छी बारिश हुई तो ठंड काफी लग रही थी। जल्दी-2 डिनर करके हम लोग अपनी-2 रजाइयों में जा घुसे।

हरिद्वार से यात्रा शुरू

जहाँ चार यार मिल जायें -- बांये से विकास, मैं, "पंडतजी" और मोनू 



फोटो आभार - मोनू
धारी देवी मंदिर से थोडा आगे अलकनंदा के बीच पर
मंदाकिनी के मुहाने पर मैं, विकास और "पंडत"



स्टाइल सा मारते हुए मोनू - इसे मैंने कई बार कहा कि भाई फोटो खिंचाते टाइम मुंह बंद रखा कर !!!

"पंडतजी"

 तीनों के तीनों अपने -अपने गेजेट्स में लगे हुए हैं!!!!

डॉन सा बना दिया मोनू ने मुझे इस फोटो में !!!!
अगले दिन सुबह गुप्तकाशी स्थित होटल की छत से लिया गया चौखंबा और उसके आसपास की चोटियों का नजारा
अगले भाग में जारी.........

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

डोडीताल से वापसी

24 दिसम्बर, शनिवार 
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आज मेरी डोडीताल यात्रा का तीसरा दिन है। कल मैं अपने गाइड बलबीर के साथ बेवरा से डोडीताल आ गया था और झील की परिक्रमा व आस-पास के इलाके का अन्वेषण कर लिया था। अभी चुंकि डोडीताल यात्रा का सीजन नही है तो मेरे गाइड बलबीर ने ही बात करके हम दोनो के डोडीताल पर रुकने खाने का इंतजाम एक ढाबे पर करवाया था। आज सुबह-तडके मैं सात बजे सोकर उठा। ठंड बहुत ज्यादा थी, आधे घंटे तक तो रजाई में ही पडा रहा। बलबीर मुझे बिस्तर पर ही चाय दे गया - इस कडाके की ठंड में रजाई औढकर चाय पीने का भी अपना मजा है। करीब आठ बजे में रजाई छोडकर ढाबे से बाहर निकला। बहुत ही जबरदस्त नजारा था। किसी झील का पानी इतना साफ हो सकता है, मैंने अब तक सिर्फ फोटो में ही देखा था। एकदम "क्रिस्टल क्लियर" पानी था - और शायद इसके लिये ही डोडीताल प्रसिद्ध है।


नित्य कर्म से फारिग होकर मैं डोडीताल का एक चक्कर लगाकर आया। अब तक ढाबे वाले ने चाय, आलू के परांठों का नाश्ता तैयार कर दिया था। ढाबे वाले भाई का नाम भूल गया हूं। अरे! हाँ ! याद आया मनवीर नाम है इसका तो। बडा अच्छा व्यहवार था मनवीर भाई का। हमने 2-2 परांठे अभी खाये और 1-1 परांठा रास्ते के लिए पैक करा लिया। करीब पौने नौ बजे मैं और बलबीर डोडीताल से वापस चल दिये। मनवीर भी आज ही वापस चलेगा लेकिन उसे अभी कुछ काम करना है। वो दोपहर को निकलेगा और शाम तक आराम से अपने घर अगोडा पहुंच जायेगा। डोडीताल से हल्की - हल्की चढाई चढकर आधे घंटे में हम लोग भैरो मंदिर पहुंच गये। यहाँ के बाद से बेवरा तक का पूरा रास्ता उतराई वाला है।  तेज-तेज चलते हुए और शॉर्टकट मारते हुए करीब सवा बारह बजे हम लोग बेवरा पहुंचे। यहाँ उन्ही चाचा के ढाबे पर चाय बनवायी और साथ में लाये हुए परांठे खाये।

सुबह डोडीताल से हम यह सोचकर चले थे कि आज अगोडा में रुकना है। बलबीर के घर पर रूकने का प्लान था, सोचा थोडी और मदद इस बेचारे के परिवार की भी हो जायेगी। मगर जब साढे तीन घंटे में ही बेवरा पहुंच गये तो दिमाग ने मन के उपर हावी होना शुरू कर दिया। यार ! साढे तीन घंटे में हम लोग करीब चौदह किलोमीटर आ गये। अगर आज रात अगोडा रुके तो कल फिर सुबह-सुबह वहां से भागना पडेगा और हरिद्वार पहुंचते-2 रात हो जायेगी। इससे अच्छा तो आज ही उत्तरकाशी निकल जाता हूँ। आराम से होटल में रहूँगा और कल फिर आराम से वक्त रहते हरिद्वार पहुंच जाउंगा। मन से एक बार फिर आवाज आई, अरे भाई! पैसे तो वहां भी लगेंगे रहने खाने के और शायद अगोडा से ज्यादा ही लगेंगे। मगर वहां आराम ज्यादा रहेगा और अभी तो वक्त भी है आज ही या कल सुबह काशी - विश्वनाथ मंदिर भी देख लूंगा - दिमाग ने दलील पेश की। खैर, दिमाग की बात मानी गयी और फैंसला किया कि आज ही उत्तरकाशी निकलना है। बलबीर को भी अपने विचार और तमाम दलीलों से अवगत कराया जिसको उसने आराम से स्वीकार कर लिया।

चाचा से अलविदा ले एक बजे के करीब हम बेवरा से निकल लिए। बलबीर ने बताया कि सर अगर चार बजे से पहले संगमचट्टी पहुंच गये तो आराम से जीप मिल जायेगी उत्तरकाशी के लिये, इसलिए थोडा तेज चलिये। हालांकि बेवरा से अगोडा के दो किलोमीटर का रास्ता चढाई वाला है मगर फिर भी करीब 35 मिनट में ही हम अगोडा पहुंच गये। मुश्किल से पांच-सात मिनट रुके, पानी पिया और निकल लिए संगमचट्टी के लिये।

संगमचट्टी से करीब एक किलोमीटर पहले ही बलबीर चलने में असमर्थ सा होने लगा। बोला सर मैं थक गया हूँ और अभी मुझे 4-5 किलोमीटर वापस अगोडा भी जाना है। प्लीज! आप अब अकेले निकल जाईये। मैने कहा ठीक है यार एक किलोमीटर की ही तो बात है, तू निकल जा वापस, मैं चला जाउंगा। बलबीर का हिसाब कर उसे विदा किया और नीचे संगमचट्टी की ओर कदम बढा दिये। करीब पौने तीन बजे मैं संगमचट्टी पहुंच गया। मन में खुशी के भाव थे कि मैंने भी डोडीताल ट्रैक पूरा कर लिया है। मलाल था तो सिर्फ एक बात का कि बर्फ नही मिली जिसके लिए इस दिसम्बर के अंतिम सप्ताह मे मैं यहाँ आया था। दिन छिपने से पहले ही मैं उत्तरकाशी पहुंच गया। होटल में कमरा लेकर, गर्म पानी से हाथ पैर धुले। हल्का आराम किया और फिर काशी - विश्वनाथ मंदिर देखने के लिये चला गया।

कल रात को मैं इसी बिस्तर पर सोया था।


सुबह-2 डोडीताल किनारे चौधरी साब

सुबह के समय डोडीताल के आसपास का दृश्य

है ना एकदम "क्रिस्टल क्लियर" पानी

डोडीताल से वापसी शुरू - एक किलोमीटर की हल्की सी चढाई और सामने इस पूरे ट्रैक का उच्चतम भाग अर्थात भैरो मंदिर
सामने गिदारा टॉप और उसके आस-पास की चोटियों के पीछे बादल आने शुरू हो गये हैं। अपनी तीन दिन की यात्रा में मैंने आज पहली बार बादलों की हल्की सी छटा देखी है। शायद आने वाले 2-3 दिनों में यहाँ बारिश या बर्फबारी होगी।

मांझी के दो किलोमीटर बाद दयारा बुग्याल की ओर जाने वाले रास्ते के पास - थकान उतनी है नही जितनी शायद लग रही हो चेहरे से


डोडीताल से वापसी के रास्ते मे कई जगह हमने शॉर्टकट रास्ते का इस्तेमाल किया था जिससे लगभग दो-ढाई किलोमीटर हमें कम चलना पडा था। उसी एक शॉर्ट से लिया गया एक फोटो

शॉर्टकट के रास्ते उतराई - सामने बलबीर खडा मेरी राह देख रहा है।

अलविदा चाचा

बेवरा से वापस अगोडा की ओर

प्राथमिक विद्यालय अगोडा - ये बायीं ओर वाला लडका बलबीर का पुत्र है।

बलबीर का घर और उसकी बेटी

काशीविश्वनाथ मंदिर उत्तरकाशी - रात का समय होने की वजह से फोटो अच्छी नही आ सकी

अगले दिन उत्तरकाशी से हरिद्वार के रास्ते में उत्तरकाशी से 25 किलोमीटर दूर धरासू बेंड - यहाँ से दांयी ओर वाला रास्ता जिस पर जीपें खडी दिख रही हैं वो बडकोट होते हुए यमनोत्री जाता है जबकि बांयी ओर वाला रास्ता चम्बा होते हुए ऋषिकेश
अगले दिन यानी 25 दिसम्बर को सुबह नौ बजे वाली बस से मैं हरिद्वार के लिए निकल लिया। काफी दिनों के बाद एक ट्रैक किया, काफी आनंद आया। यात्रा का यह भाग प्रकाशित करने में हुई महीनों की देरी के लिए माफी चाहूंगा, कुछ व्यस्तता के चलते समय से नही लिख पाया। उम्मीद है आगे समय से लेखन कार्य करूंगा। आप सबका आभार !!!

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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

डोडीताल यात्रा: बेवरा चट्टी से डोडीताल


इस यात्रा वृतांत को शुरु से पढने के लिये यहाँ क्लिक करें।
 घर पर अपनी सलामती की सूचना देकर मैं और बलबीर नीचे बेवरा में चाचा के ढाबे पर लौट आये। दिन छिपने लगा था और चाचा ने डिनर की तैयारी शुरू कर दी थी। चूल्हे पर दाल पक रही थी, आलू राई की सब्जी पहले ही बन चुकी थी। मनीराम भी आ गया। मनीराम यानी मनी मूल रूप से नेपाली है और उपर डोडीताल में फ़ॉरेस्ट रेस्ट हाउस में चौकीदार है। साथ ही वह वहाँ स्थित गणेश मंदिर की धर्मशाला की देखरेख भी करता है। आजकल ऑफ सीजन होने की वजह से अपने बेवरा स्थित घर में रहने आया हुआ है। मनीराम ने अपनी पूरी जिंदगी डोडीताल और यहाँ आने वालों की सेवा में लगा रखी है और पिछले 24 सालों से यहीं रह रहा है। बलबीर ने बताया कि डोडीताल से आगे दारवा टॉप से एक रास्ता हनुमान चट्टी तक जाता है जिसे एक दिन में कवर किया जा सकता है। इतना सुनते ही मेरे दिमाग में विचार आया कि क्यूं न डोडीताल से वापस इसी रास्ते से आने के बजाय सीधे हनुमान चट्टी निकला जाये। गाइड को भी कोई अतिरिक्त पैसा नही देना पडेगा। और चूंकि ये पूरा रास्ता दारवा पास को पार करके जाता है तो सामने वाले नजारे भी जबरदस्त होंगे। बलबीर ने बताया कि पूरे रास्ते से हिमालय का जबरदस्त व्यू दिखता है - बंदरपूंछ, स्वर्गारोहिणी से लेकर चौखम्बा तक सारी बर्फिली चौटियां सामने ही दिखती हैं। मैंने तुरंत इस ट्रैक के लिए अपना मन बना लिया। मगर जल्द ही मनी ने मेरे इस सपने को तोड दिया। उसने बताया कि डोडीताल से हनुमान चट्टी का ट्रैक करीब 32-33 किमी का है जिसको एक दिन में किसी भी हालत में पूरा नही किया जा सकता। डोडीताल से दारवा तक पांच किमी की खडी चढाई है जिसमें कम से कम तीन घंटे लग जाते हैं जबकि आगे भी रास्ता चढाई - उतराई वाला ही है। रास्ते में कहीं कोई रूकने का ठिकाना भी नही है। और बात भी सही थी। ट्रैक चाहे कैसा भी हो एक दिन में 33 किलोमीटर पैदल चलना मेरे बसकी बात नही है। उपर से सर्दियों का मौसम, दिन भी सबसे छोटे होते हैं इस मौसम में। आइडिया ड्रॉप कर दिया गया। मन को समझा लिया कि यार फिर कभी गर्मियों में आउंगा तो इस चक्कर को पूरा करके हनुमान चट्टी तक जाउंगा और वहां से फिर यमनोत्री। दाल पकती रही और हम लोगों की बातों का सिलसिला चलता रहा।

दिन छिपते ही घुप्प अंधेरे ने सारे वातावरण को अपने आगोश में ले लिया। एक मात्र रोशनी थी तो बस चाचा के ढाबे पर - पैट्रोमैक्स और चूल्हे में जलती आग की। चूल्हे के चारों तरफ बैठकर हम लोगों ने खाना खाया और सोने के लिये अपने-2 बिस्तरों में जा घुसे। चाचा ने यहाँ 2-3 पक्के कमरे बना रखे हैं, इनमें से दो कमरों में हमारे बिस्तर लगे थे। एक में मेरा बिस्तर था जबकि दूसरे में चाचा और बलबीर का। सर्दियों का मौसम था और यहाँ ठंड बहुत थी रजाई में घुसते ही कब नींद आ गई पता ही नही चला। मगर रात में एक अजीब घटना घटी। करीब तीन बजे मेरे कमरे के दरवाजे पर किसी ने बडे जोर से दस्तक दी जिससे मेरी नींद खुल गयी। बाहर कोई जानवर आया था -हिरण हो शायद, जो सर्दी में कहीं आसरे की तलाश में था। उसने कम से कम 5-6 बार मेरे दरवाजे पर टक्कर मारी। दरवाजा भी ऐसा था कि इसमें सिर्फ एक ही चटकनी थी, वो भी उपर की तरफ। उस जानवर के बार-बार दरवाजा पीटने की वजह से कहीं वो टूट न जाये मुझे बस इसी बात का डर लग रहा था। उधर चाचा और बलबीर घोडे बेचकर सो रहे थे। खैर, थोडी देर तक टक्कर मारने पर जब वो जानवर सफल नही हो सका तो बेचारा वहां से चला गया और मेरी जान में जान आयी। इस घटना के बाद मुझे अब नींद नही आयी। मैं बस सुबह होने का इंतजार करने लगा। सुबह नाश्ते के दौरान चाचा और बलबीर को इस घटना के बारे में बताया तो पट्ठे बोले कि हमें तो पता नही चला। हम तो सो रहे थे। नाश्ते में चाय मैगी खाकर हम लोग डोडीताल के लिए निकल लिए। बेवडा से डोडीताल 14 किलोमीटर है, मतलब हमें पहुंचने में शाम ही हो जायेगी और रास्ते में कहीं कुछ खाने को भी नही मिलेगा। इसीलिए साथ में रास्ते के लिए तीन आलू के परांठे भी पैक करा लिए।

करीब पौने आठ बजे हम बेवरा से चले। शुरू में चार किलोमीटर यानी धारकोट तक चढाई भरा रास्ता है। पूरे पहाडों पर गजब का सूखा पडा था। सारी घास सूख चुकी थी। यहाँ तक की पेड तक सूख रहे थे। और ऐसा हो भी क्यों ना? दिसंबर का आंखिरी सप्ताह आने वाला था और अब तक यहाँ बारिश या बर्फबारी नही हुई थी। जबकि आमतौर पर यहाँ दिसम्बर के पहले सप्ताह में ही बर्फ पड जाया करती है। पूरे रास्ते पर धूल उड रही थी। थोडी दूर सामने तो किसी पहाडी पर धुंआ भी उठता दिखायी दिया। शायद वहां जंगल में आग लग गयी थी। इस सबको ग्लोबल वार्मिंग का नतीजा कहें या कुदरत की निश्ठुरता, उत्तराखंड के जो पहाड इन दिनों बर्फ से लकदक रहते थे वहां गजब का सूखा पड रहा था - जंगल धधक रहे थे। दो दिन बाद यात्रा पूरी करके जब मैं घर पहुंचा तो मैंने 24 दिसम्बर के अखबार में पढा कि गंगोत्री से थोडा पहले स्थित हर्शिल के जंगलों में इन दिनों आग लगी हुई थी जिसे प्रशासन 2-3 दिन तक नही बुझा पाया था। वो तो भला हो उपर वाले का कि 25 दिसम्बर को उत्तर भारत का मौसम बिगडा और सारे पहाडी राज्यों समेत उत्तराखंड में भी बारिश और बर्फबारी हुई जिससे वो आग स्वत: ही बुझ गयी।

करीब दस बजे हम धारकोट पहुंचे। यहाँ यात्रियों के कुछ देर आराम करने के लिए एक शेड बना है। जिसकी वजह से इस जगह को लोग छतरी कहते हैं। यहाँ हम लोगो ने 10-15 मिनट आराम किया। यहाँ अस्सीगंगा काफी गहरी घाटी में बहती है जबकि अस्सी गंगा के उस पार सुप्रसिद्ध दयारा बुग्याल है। छतरी से डोडीताल 10 किमी है जबकि मांझी 5 किलोमीटर। मांझी एक कैम्पिंग स्थल है और यहाँ काफी झोंपडियां बनी हुई हैं। डोडीताल जाने वाले ज्यादातर ट्रैकर्स अपने टेंट वगरह लेकर आते हैं और मांझी में भी एक रात विश्राम करते हैं। मांझी से करीब 2 किलोमीटर पहले एक रास्ता सतगडी होते हुए दयारा बुग्याल भी जाता है। दयारा बुग्याल यहाँ से 15 किलोमीटर दूर है। हाँलाकि दयारा का मुख्य रास्ता उत्तरकाशी-गंगोत्री रोड पर स्थित भटवाडी के पास बरसू से है। मगर डोडीताल की तरफ से भी दयारा बुग्याल जाया जा सकता है।

साढे बारह बजे हम माझी पहुंचे। यहाँ से दूर एक पहाडी के पीछे बंदरपुंछ चोटी के हल्के से दर्शन हुए। लंच का समय हो रहा था और भूख भी लगने लगी थी। चाचा के ढाबे से लाये गये परांठे निपटाये गये। अचार के साथ आलू के परांठे खाकर आनंद आ गया। मांझी में हमने कुछ देर आराम किया और फिर अपनी आज की मंजिल की ओर बढ चले। मांझी से डोडीताल पांच किलोमीटर रह जाता है। रास्ता भी हल्की चढाई वाला ही है। अपने पास समय बहुत था तो हम आराम से फोटो खींचते हुए चलने लगे। मांझी से आगे दो झरनें मिले जो कि आंशिक रूप से जमें हुए थे। इसका मतलब था कि भले ही अभी यहाँ बारिश या बर्फबारी न हुई हो मगर ठंड अच्छी खासी पड रही थी, इसीलिए झरनों में बहता पानी जम गया था। मांझी से करीब साढे तीन - चार किलोमीटर चलने के बाद एक जगह आती है भैरों मंदिर, यह पूरे डोडीताल ट्रैक का उच्चतम स्थान है। यहाँ भैरों बाबा का एक छोटा सा मंदिर बना है। भैरव मंदिर के बाद पूरा रास्ता हल्की उतराई वाला है। करीब एक किलोमीटर की उतराई के बाद रास्ता समतल हो जाता है। थोडा सा और चलने पर जंगल अचानक से खत्म हो जाता है, और हम पहुंच जाते हैं डोडीताल - साफ पानी की एक उच्च हिमालयी झील और भगवान गणेश का स्थान।

करीब तीन बजे हम लोग डोडीताल पहुंचे। यहाँ एक फॉरेस्ट रेस्ट हाउस है जिसमें ठहरनें के लिए बुकिंग डी0 एफ़0 ओ0 ऑफिस उत्तरकाशी से होती है। यहाँ भगवान गणेश का एक मंदिर भी है, पास ही इस मंदिर की धर्मशाला है। साथ ही एक - दो ढाबे बने हुए हैं जो अगोडा वालों के हैं। इन्ही ढाबे में से एक में आज हम लोग रुकेंगे। अभी तीन ही बजे थे, दिन काफी था। थोडी देर आराम करके और चाय पीकर हम लोग ताल पर घूमने निकल लिए। सबसे पहले गणेश जी को नमन किया। मंदिर हाँलाकि बंद था। यहाँ भी उत्तराखंड के ज्यादातर मंदिरों की तरह ही कपाट सिस्टम है। डोडीताल स्थित गणेश मंदिर के कपाट भी उसी दिन बंद होते हैं जिस दिन यमनोत्री जी के कपाट बंद होते हैं।

डोडीताल के चारों ओर एक पगडंडी बनी हुई है, जिससे झील की परिक्रमा की जा सकती है। हम लोग भी परिक्रमा के लिए निकल गये। इस दौरान हमें "गोल्डन स्प्राउट फिश" भी दिखाई दी जो कुछ ही उच्च हिमालयी झीलों में पायी जाती हैं। ताल की परिक्रमा करके और ढेर सारे फोटो खींचकर हम लोग ढाबे पर लौट आये। दिन छिपने लगा था और ठंड बढनी शुरू हो गयी थी। जल्दी ही हम लोग डिनर करके अपनी - अपनी रजाईयों में जा घुसे।

ये है धारकोट। इस यात्रीशेड की वजह से यहाँ के लोग इस स्थान को छतरी भी कहते हैं।

पहाड में सूखा!!!


अस्सीगंगा के दूसरी ओर वाली पहाडी का नजारा। सामने थोडा दांयी ओर जो थोडा समतल सा भाग दिख रहा है वो दयारा बुग्याल का सबसे उपरी भाग है।


इस  जगह को छोटी मांझी कहते हैं।
दयारा बुग्याल जाने वाले रास्ते के बारे में जानकारी देता वन विभाग का एक सूचना बोर्ड

दिसम्बर में वीरान पडी मांझी

मांझी  से बहुत दूर दिखती बर्फ से ढकी बंदरपूंछ चोटी की एक झलक

"मोहब्बते" फिल्म वाले पत्ते!!!

झरने का बहता पानी जम गया है - मतलब ठंड बहुत है।


भैरव मंदिर पर  लगा बोर्ड। मेरे हिसाब से यह बोर्ड भैरव मंदिर की समुद्र तल से ऊंचाई के बारे में गलत जानकारी दे रहा है। क्योंकि ये जगह पूरे डोडीताल ट्रैक की सबसे ऊंची जगह है। इसकी ऊंचाई 2900 मीटर दर्शायी गयी है जबकि डोडीताल 3050 मीटर पर है। मेरे अनुमान से ये जगह 3150 - 3200 मीटर के आस पास होनी चाहिये। किसी ने इस बोर्ड पर ही खुरचकर 3223 मीटर लिखा है जो कि शायद सही है।


जंगल खत्म, बस पहुंच गये डोडीताल।


डोडीताल झील और उससे निकलती अस्सीगंगा

सामने थोडा बांयी ओर दारवा टॉप है। डोडीताल से दारवा तक खडी चढाई साफ देखी जा सकती है।

डोडीताल स्थित गणेश मंदिर

उपर पहाड से झील तक आने वाली एक छोटी सी जलधारा
डोडीताल झील में पायी जाने वाली "गोल्डन स्प्राउट फिश" की एक झलक - काश ! मेरे पास और अच्छा कैमरा होता

डोडीताल से निकल आगे बढती अस्सीगंगा

फॉरेस्ट रेस्ट हाउस - डोडीताल


अ‍गले भाग में जारी.........

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